नहीं सकता । हो सकता है कि कोम शरणार्थी मामी यहाँ खुश हो, पैसा भी कमाने बने। फिर भी खुसके दिलसे छुटक कभी नहीं जायगी । झुसे अपना घर तो याद आनेगा ही । दिलमें गुस्सा और नफरत भी रहेगी । हमने दोनोंने बुरा किया है । दोनों बिगड़े हैं । जिसीलिये दोनों भोग रहे हैं । किसने पहले किया, किसने पीछे, किसने फ्म, किसने ज्यादा, यह सोचनेसे काम नहीं चलेगा । हम सर अपने अपने विगारो नहीं सुधारेंगे, सो हम दोनों मिट जावेंगे । जब तक हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में दिलका समझौता नहीं होता, हमारा दोनोंका दुव महीं मिट सकता । दोनों अपना अपना बिगार सुधार लें, तो हमारी बिगडी बाजी फिर सुघर जाने । शरणार्थी और मेहनतकी रोटी सुन्हीं भाभीने लिखा है कि शरणार्थियोंके कैम्पोंमें कुछ घरेलू धन्धे सिलाये जायें तो अच्छा है, जिससे वे कमाकर अपना वर्च निकाल सकें । नुझे यह बात बहुत अच्छी लगी । सब चाहेंगे तो मैं सरकारसे कहूँगा और सरकार वड़ी खुशीसे जिसका भिन्तजाम कर देगी । सरकारके हो जिससे करोड़ों रुपये बचेंगे। मै भाभीने खत लिखा है, वह भिसके लिये चाहता हूँ कि जिस आन्दोलन करें। सब कहें कि मुफ्तकी मिली शरणार्थियोंको राजी करे | शरणार्थी खुद यह खीरसे अपनी मेहनतका रूखा-सूखा कण कहीं अच्छा है । सुससे सुनका मान बसेगा । मर्यादा भी बचेगी । अभी तो मेक हिन्दू बहन मेरे पास आभी थी। कहती थी कि यह अपने घरका ताला बन्द करके नहीं गयी, तो पाँच छह सिक्खोंने आवर ताला तोड़ लिया और घरमें रहना शुरू कर दिया । बहनने आकर देखा, तो पुलिस में रिपोर्ट लिखामी । सुना है, कुछ सिक्ल पकड़े भी गये । अक भाग गया। हिन्दुओं और दूसरोंने भी भेसी गन्दी बातें की हैं। जिनसे हमारे धर्मपर बड़ा कलंक लगता है । जैसी बातें वन्द होनी चाहियें । मुम बहनने मुझसे पूछा, क्या मै घर छोड़ दूँ ? मैंने कहा - कभी नहीं । सिक्ख भाभी अपना मान रखें, अपनी Yu
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