मै तो मंत्रियोंसे यह आशा करूँगा कि वे लोगोंके पागलपनके सामने झुकनेके बजाय खुनके पागलपनको दूर करनेकी कोशिश में अपने प्राणोंकी चाजी लगा देंगे । सारे भाषणमे गाधीजीको आवाज बहुत धीमी थी, फिर भी वे मुद्दोंके शहरकी तरह दिखाओ देनेवाली दिल्लीके अपने दौरेका बयान करते रहे । क्यानके बीच झुन्होंने अक जगह कहा, जिस मकान में मे रहता हूँ, खुसमें भी फल या शाक-भाजी नहीं मिलती। क्या यह शरमकी बात नहीं है कि कुछ मुसलमानोंके मशीनगन या वन्दूक वगैरासे गोलीबार करनेके कारण सब्जीमण्डीमें शाक-भाजीका सिलना बन्द हो गया ? शहरके अपने दौरेमें मैंने यह शिकायत सुनी कि शरणार्थियोंको रेशन नहीं मिलता । जो कुछ दिया भी जाता है, वह खाने लायक नहीं होता । जिसमें अगर दोष सरकारका है, तो झुतना ही दोष चरणार्थियोंका भी है, जिन्होंने जरूरी कामकाजको भी रोक दिया है । अन्होंने यह क्यों नहीं समझा कि भैंसा करके वे अपने आपको नुकसान पहुँचा रहे हैं । अगर सुन्होंने अपनी तमाम सच्ची शिकायतोंको दूर करनेके लिये सरकारपर भरोसा किया होता और कायदा पालनेवाले नागरिकोंकी तरह बरताव किया होता, तो मे जानता हूँ, और इन्हें भी जानना चाहिये, कि सुनकी ज्यादातर मुसीबतें दूर हो जाती । मैं हुमायूँके मकबरे के पास मेवोंकी छावनी में गया था । सुन्दोंने मुझसे कहा कि हमें अलवर और भरतपुर रियासतोंसे निकाल दिया गया है । मुसलमान दोस्तोंने जो कुछ भेजा है, इसके सिवा हमारे पास खानेकी कोमी चीक नहीं है । मैं जानता हूँ कि मेव लोग बबी जल्दी सुमारे जा सकते और गड़बड़ी पैदा कर सकते हैं । लेकिन सुसका यह जिलाज नहीं है कि हे न चाहनेपर भी यहाँसे निकालकर पाकिस्तान भेज दिया जाय 1 शुसका सच्चा भिलाज तो यह है कि सुनके साथ मिन्सानोंका-सा बरताव किया जाय और सुनकी कमजोरियोंका किसी दूसरी बीमारीकी तरह मिलाज किया जाय । जिसके बाद मे जामिया मिलिया गया, जिसके बनानेमे मेरा बढा हाथ रहा है। डॉ० जाकिर हुसेन मेरे प्यारे दोस्त हैं । जुन्होंने सचमुच
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