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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/३४१

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हरिहर रहता है रे का होग्य ही चन्ते हैं। रामचन्द्र हुन् चन्द्र जी हमरी तरह जानी है, यह ना नहीं पा चिठीक कुल बल आधा भी, कुन्हें दे दिया जायगा । पर वह सन्दे ये कान्ति बाहरी चोखोपर निर्भर नहीं है। जिसने बनवाते रामचंच सुन्दर पुड मेंबर नहुआ। कार हिन्दू और हिस्स जिस नामको जन्ते होते, तो यह की तहर नपरले सि बा और हे भी करते, वे हृद शान्त रहते । अगर ये हिन्दुकों और सिक्खों दिलोनें घर हैं, तो तोकपरमार होगा हो । कैम्प-जीवनका आदर्श मैंने सुना है कि वह कैम्प कुछ सह चल रहा है । मे यह बात तक तक पूरी तरह नहीं नाम सकता. जब तक सूत्र शरणार्थी लेवर किस कैम्पन सुचले ज्यादा सानी और तरतीबी न रखें. जिवनी दिल्ली शहरने दिनानां देती है। आपको जो सुतीत भोगनी पड़ी हैं, यह ने जानता हूँ । आपने से कुछ बड़े बड़े घरोंके लोग थे । पर आपके लिये सुतने ही भारानकी सुम्नीद यहाँ करना फिजूल है। आप सबको सीखना चाहिये कि नमो जरूरतोंके मुताबिक अपनेको कैसे डाला जाब, और जहाँ तक वन पड़े जिस हालतको ज्यादा अच्छा बनाना चाहिये। मुझे याद है, सन १८९९को बोअर-वारसे ठीक पहले भोज लोग ड्रान्सवालको होकर वहाँसे नेहाल गये थे । वे जानते थे मुसीबतस कैसे सामना किया जाने । वे सबके सब बराबरोकी हैसियतसे रहते थे । सुनमें से भेक भिजीनियर था और मेरे साथ बदमी का काम करता था । हम सदिगो विदेशियोंक गुलान रहे हैं, भिसलिये हमने यह बात नहीं सीखी। अब तक हम जाजाद हुआ है - और मायादी कैसी अनमोल थरकत है मे झुम्मीद करता हूँ कि शरणार्थी भाभी बहन अपनी जिस मुसीवत्से भी पूरा फायदा झुठावने । वे अपने मिस कैम्पको अक सा आदर्श कैम्प बना देंगे कि अगर सारी दुनियासे नहीं, तो -