मुझे लगता है कि जिन ऑक्टो सामने कुछ वक्ता: हो चना है कि यह बात मेरा अज्ञान मुझसे नहीं कहा जा कहला रहा हो । अगर सा है तो ज्यादा जानकार लोग दूसरे माँच्छे बढ़ाकर नेरा अज्ञान दूर करनेको कृपा करें। मैंने सूपर लिखी बातें मान को है, क्योंकि जानकार लोगो न नी मिठी तरफ है । अब जनता किसी यानको मान्दी है और भेजी चीज चाहती है, तय लोकराज झिरोचे स्थान नहीं रहता । न्नवाके प्रतिनिधियोंको जनताकी लोग ठीक रूपने रतनी चाहिये, ताके वह पूरी हो सके । अनताका नानतिक सहगर ते वह कहानियों बीननेमें बहुत मदद दे चुका है । कहते हैं कि दुनियानें जितना पेट्रोल निरता है, सुन की सेना हो हिन्दको मिलता है । जिससे निराश होनेश कारण नहीं । इनाचे नोटरें तो चही है। क्या जिसका यह मतलब है कि क्योंकि इन युद्ध करनेवाले लोग नहीं है, मित्राने हमें ज्यादा पेट्रोलकी जरूरत ही नहीं ! और अगर हमें ज्यादा जरूरत पड़े और दुनियानें जितना पेट्रोल निकलना है, हुतना ही निकले तो बाकी दुनिया के किने पेट्रोठ न पड़ेगा ? टीमकार मेरे घर मन्नानको न करें । मैं दो प्रकाश चाहता हूँ। अन्त में अपना मेरा हिप, तो प्रकाश पा नहीं सकता । सवाल यह शुठना है कि अगर हमारे हिस्सेने बहुत कम पेट्रोल बात है, तो कांटे बजारले पेट्रोल मी कहाँ बाता है, और गाड़ियात्रा किसूल माना जाना किला किसी तरहको कैसे चलता है ? पत्र लिखनेवाले भाकीने जो की बात की है, वही हो, सोनेची है। अंकुश अनीके किसे आशीर्वाद रूप है, और गरीब के विभे ठान्त । और अंश रखा जाता है ग चार | अगर किनारे रिवाज मिली तरह समन्ता है, तो सुरे चेक पल भी विचार किये बिना निश्चल देना चाहिये ।
पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/३४७
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