नहीं । मगर काफी लोग मेरी बात मानते थे । तब मे महिंसक सेनाका सेनापति था । आज मेरा जंगलमै रोना समझो । मगर धर्मराजने कहा था कि अकेले हो तो भी वो ठीक समझो, वही करना चाहिये । सो में कर रहा हूँ। जो हुकूमत चलाते हैं, वे मेरे दोस्त हैं । मगर मैं कहूँ शुसके मुताविक सब चलते हैं भैसा नहीं है । वे क्यों चलें ? मैं नहीं चाहता कि दोस्तीके खातिर मेरी बात मानी जाय । दिलको लगे तभी माननी चाहिये । अगर मे कहूँ लुसी तरह सब चलें, तो आज हिन्दुस्तानमें जो हुआ और हो रहा है, वह हो नहीं सकता था। मै कोभी परमेश्वर तो हूँ नहीं । तो भी मुझसे दुखी भाभी कहते हैं कि हमारे रहने, खाने और पहननेका कुछ प्रबन्ध तो होना चाहिये । शरणार्थियोंका फर्ज बात सही है । शरणार्थियोंने क्या गुनाह किया 2 ने तो बेगुनाह हैं । हमारे भागी हैं। मुझे जो मिलता है, यह सुन्हें न मिले, यह जिन्साफ नहीं । मुन्हें शिकायत करनेका हक हैं। मैं कहूँगा कि वे मकान भले माँगें, मगर साथ साथ मे सुनसे यह भी कहूँगा कि सुन्हें जो काम दिया जाय और झुनसे हो सके, सो सुन्हें करना चाहिये । जो घर मिले लुसमें रहना चाहिये 1 घास-फूसकी झोंपडी मिले, तो सुसम श्री आनन्दसे रहना चाहिये। वे जैसा न कहें कि हमें महल ही चाहिये । जो खाना कपड़ा मिले, मुसमें मुन्हें सन्तोष मानना चाहिये | घासके विद्यानोंसे रुकी गाधीका काम चल जाता है। अगर हम भेसे सीधे रहें, तो मैचे च सकते हैं। मजदूर लिखना-पढ़ना नहीं कर सकता, मगर लिखने-पढनेवाला मजदूरी तो कर सकता है। कराचीकी वारदाते कराचीमें क्या हो गया, आपने अखबारोंमें देसा ही होगा । सिंधमें हिन्दू और सिक्ख खाज रह नहीं सकते। जिस गुरुद्वारे वे लोग सिंधसे आनेके लिये स्के थे, लुसी गुरुद्वारेपर हमला हुआ । हुकूमत कहती है कि वह लाचार हो गयी है । रोक नहीं सकी । पर दवाने की कोशिश करती है । जिस तरह हुकूमतवाले लाचार हो जाते हैं, तो सुन्हें हुकूमत ३३१
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