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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/३५८

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हुकूमतका हुक्म आया कि कोठी खाली कर दो । किसी दूसरी हुकूमतके मेलचीके लिये झुसकी जरूरत है । मैं मानता हूँ कि न्हें बाहरके भेलची वगैराके लिये मकान चाहिये, तो वह खाली करना चाहिये । पर बदले झुन्हें रहनेकी जगह मिलनी चाहिये । रामायण वगैरामें पढ़ा है कि शुन दिनों मंत्रके जोरसे शहर खड़े हो जाते थे । आज वह हो नहीं सकता है। वह मंत्र हमारे पास नहीं है। पहले भी था या नहीं, वह भी मै नहीं जानता । मिसलिमे जो मकान हुकूमतको चाहिये, वह के, लेकिन जिनसे के, सुनके लिने दूसरा भिन्तनाम तो होना चाहिये । सुन्हें सड़कपर बैठनेको कोभी हुकूमत नहीं कह सकती । पर मै झुन्हें पूरी तसल्ली नहीं दे सका। मैने कहा, मै हुकूमत नहीं चलाता हूँ, हुकूमतका सिपाही भी नहीं हूँ। मेरा अपना घर भी नहीं । मै मानता हूँ कि सुनकी बात सही नहीं है । अगर है, तो बड़े तु सकी बात है । जो आदमी कानूनसे किसी मकान में रहते हैं, खुनको जैसा नोटिस नहीं दिया जा सकता। वो लुटेरा होकर किसीके घरमें घुस बैठता है, सुसे तो निकालें नहीं तो क्या करें ! पर कानूनसे रहनेवालेको जैसे नहीं निकाल सकते । नेक गलतफहमी 1 भेक भाभी लिखते हैं कि पहले मैंने कहा था कि वम्बमें भेक आदमीको भेक सेर चावल रोज मिलता है । मैंने मेक दिनका नहीं कहा था, अक हफ्तेका कहा था । ओक सेर रोजका तो बहुत हुआ । वे कहते हैं भेक सेर नहीं, पाव सेर रोज मिलता है । मेरी निगाहमें वह भी अच्छा है । पहले मितना नहीं मिलता था । भेक हफ्तेका अक सेर मिलता था । अगर मैंने भेक दिनका कहा है, वो वह भूल है । यह समझना चाहिये कि आज भेक सेर चावल रेशनमें कैसे दिये जा सकते हैं ? बिड़ला - भवनमें क्यों १ दूसरे भाभी लिखते हैं- बिबला-मवनमें आप हैं, प्रार्थना होती हैं, पर गरीब नहीं आ सकते। पहले आप भंगी-बस्सीने रहते थे 1 २२ ३३७