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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/३६०

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१२० अनुशासनकी जरूरत १०-१-१४८ भाषण से पहले साधुके कपड़े पहने हुये भेक भाभीने जिद की कि वे अपना सुत गाधीजीको पढ़कर सुनावेंगे। गाधीजीको काफी दलील करके न्हें रोकना पडा । प्रार्थना वाट गाधीजीने भाषण में कहा, यह देखने लायक बात है कि आज हम कहीं तक गिर गये हैं । साधु होनेका, सयमका, गीता आदि पदनेका जो दावा करते है, दे जितना सम्म क्यों न रखें ? सुन्हे अक धार कहने से ही बैठ जाना चाहिये | जितनी चील भी क्यों आजकल प्रार्थना सभाम आम तौर से सब लोग जितनी शान्ति रखते हैं, वह अच्छा लगता है । बहावलपुरके भाजियोंले बहावलपुरके भाभियोंको भी कैसी ही बात है । अपने दुस्खकी वात कहिये, फिर प्रार्थनामें शान्त रहिये । मुझसे किसीने कहा था कि बहावलपुरवाले भाभी बाज हमला करनेवाले हैं । प्रार्थनामें भीखते ही रहेंगे। मैने कहा मैसा हो नहीं सकता । सुनका नमूना सबके सामने रखता हूँ । सुनके दुखका में साक्षी हूँ। वे भितमीनान रखें कि नहाँक सब हिन्दू-सिक्स आ जायेगे । नवाव साहयका बचन है अगरचे में नहीं जानता कि राजा लोगोंक वचनपर कितना भरोसा रखा जा सकता है । पर नवाब साहब कहते हैं 'जो हो चुका सो हो चुका | भव यहाँपर हिन्दुओं और सिक्खोंको को fer महीं करेगा । जो जाना ही चाहेंगे, सुन्हें भेजनेका भिन्नाम रहेंगे, मुन्हें कोमी मिस्लाम क्चूल करनेकी बात नहीं होगा। जो कहेगा ।' हो सकता है, वहाँ सय सही सलामत हो । यहाँ की हुकूमत भी बेफिक नहीं है । मैं आगा रखता हूँ, अभी वहाँ सब लोग मारामसे हूँ । आप कहेंगे, वे आज ही क्यों नहीं आते है लेकिन आपको समझना चाहिये कि । ३३९