और भीश्वर मुझे झुठा ले, तो शुसमे वही बात क्या ! मगर भाज हिन्दू अपने धर्मका पालन नहीं करते, झुसका मुझे दुख है । अगर सब मुसलमानोको यहाँसे इटानेकी आयोवा पैदा कर दें, तब हिन्दू-सिक्खोंने अपने धर्मको और हिन्दको दगा दिया असा समझना चाहिये । यह समझने लायक बात है । लोग मुझे पूछते हैं, क्या मुसलमानोंके लिये यह फाका है ? बात ठीक है । मैंने तो हमेशा अकलियतोका, दवे हुमोका पक्ष लिया है। आज यहाँके मुसलमानोको मुस्लिम लीग का सहारा नहीं रहा । हिन्दुस्तानके दो हु । जहाँ भी थोड़े लोग बिना सहारेके रह जाते हैं, झुनको मदद करना मनुष्य मात्रका धर्म है। यह फाका दरअसल यात्मशुद्धिके लिये है । भवको शुद्ध होना है । सब शुद्ध नहीं होते हैं, तो मामला बिगड़ जाता है । मुसलमानोंको भी शुद्ध होना है । जैसा नहीं कि हिन्दू-सिक्ख शुद्ध हो जायँ और सुमलमान नहीं । मुसलमान भी शुद्ध और सच्चे नही बनेगे, तो मामला बिगड़ेगा । यहाँके मुसलमान भी बेगुनाह नहीं है। सबको अपना गुनाह कबूल कर लेना चाहिये। मे मुसलमानोकी खुशामद करनेके लिये फाका नहीं करता हूँ। मै तो सिर्फ मीश्वरकी ही जगामद करनेवाला हूँ । जब देशके टुकड़े नहीं हुने थे, खुसते पहले ही हिन्दू, मुसलमान और सिक्खोंके दिलोंके टुकड़े हो गये थे । मुस्लिम लीग तो गुनहगार है, पर दूसरे मुसलमानंनि, हिन्दुओने और लिक्खोंने भी गलतियाँ की है। तीनोको अगर ढिकी दोस्त बनना है, तो सुन्हं साफदिक बनना होगा । सुनके धीचमें सिर्फ औश्वर ही साक्षी रहे । भाव हम धर्मके नामसे अवमी घन गये हैं । हम तीनों धर्मले गिर चुके हैं। फाका मुसलमानोंके नामते शुरु हुआ है । सो झुनपर ज्यादा जिम्मेदारी आती है । सुनको निश्चय करना है कि सुन्हे हिन्दू-सिक्खों के साथ दोस्त बनकर, भाओ बनकर रहना है। यूनियन के प्रति बफादार रहना है । बफादार है, अंता कहनेसे काम नहीं होता है। मै तो सुनके कामोंसे देख देता हूँ । ३५१
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