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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/३७२

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अभी गाया गया, वह गुरुदेवका बनाया हुआ है । मुझे वह बहुत त्रिय है । नोआखालीकी यात्रामें वह करीब करीब रोज गाया जाता था । शुसका अर्थ है, "तेरे साथ कोभी भी नही आता है, तो भी तू अकेला ही चलता जा । तेरे साथ मीश्वर तो है ।" हिन्दू-सिक्ख अगर सच्चे नहीं बनते हैं और सुनमें भितनी बहादुरी नहीं है कि जितने थोडे मुसलमानोंको हिफाजतसे रखें, तो मै जीकर क्या करूँगा ? मै तो यही कहूँगा कि पाकिस्तानमें अगर सभी सिक्खों और हिन्दुओंको काट डालें, तो भी यहाँ भेक भी मुसलमानको हम न काटें । कमजोरको मारना बुजदिली है। । दिल्लीकी जाँच तब फाका छूटने की शर्त क्या है ? शर्त यह है कि हिन्दुस्तान के और हिस्सामें कुछ भी हो, मगर दिल्ली बुलन्द रहे, शान्त रहे । दिल्लीका जाहोमलाल आबाद रहे । मुसलमान बेखटके दिल्लीमें घूम सकें । सुहरावर्दी साहब, जो मुंडों सरदार माने जाते हैं, वे भी अकेले बेखटके घूम सकें । रातको भी चले जायें, तो सुन्हें कुछ खर न रहे । सा हो जाय, तो मेरा काका छूट जायेगा । आज तो सुहरावर्दी साहवको से प्रार्थनामें नहीं ला सकता । सुनका कोभी अपमान करे, तो वह मेरा अपमान होगा | यह मुझसे सहन नहीं होगा । सिलि में न्हें नहीं लाता । सुहरावर्दी कैसे भी हों, कितना मैं कह सकता हूँ कि कलकत्ते न्होंने मेरा पूरा साथ दिया । मुसलमान हिन्दुओंके मकान दवाकर बैठ गये थे, वहाँसे सुन्होंने मुसलमानोंको खींच खींचकर निकाला था । मै हिन्दुस्तान की, हिन्दुओंकी, मुसलमानोंकी, पारसियोंकी, श्रीसामियोंकी -किसीकी भी नदामत ( शरदिन्दगी ) नहीं चाहता हूँ। हम सब सच्चे चर्ने, तब हिन्द चा झुठेगा । ३५३