१२८ आगेका काम १८-१-१४८ मैने थोडा तो लिख दिया है। वह सुशीला वहन आप लोगोंको पढ़कर सुना देगी । आजका दिन मेरे लिये तो है, आपके लिये भी मंगल-दिन माना जाय । कैसा अच्छा है कि आज ही गुरु गोविन्दसिंघकी जन्म-तिथि है । सुखी शुभ तिथिपर मे आप लोगोंकी दयासे फाका छोटका हूँ । जो दया आप लोगोंसे, दिल्लीफे निवासियोंसे, दिल्लीमें जो हु जी गरणार्थी पड़े हैं सुनसे, और यहाँको हुकूमतके सव कारोवारसे मुझे मिली है, मुसे मुझे लगता है कि मैं जिन्दगी भर भूल नहीं सकूँगा । कलकत्तेम असे ही प्रेसका अनुभव ने किया । यहाँपर मे यह कैसे भूल सकता हूँ कि शहीदtreat sonia uड़ा काम किया । अगर वे मदद न करते, तो में वहाँ ठहरनेवाला न था। शहीदसाहबके लिये हम लोगोंके दिनमें बहुत शकूक अभी मी हैं । सुखसे हमें क्या ? भाम हम सीखें कि कोसी भी जिन्सान हो, कैसा भी हो, उसके साथ हमें दोस्ताना तौरसे काम करना है । हम किसीके साथ किसी हालत में दुश्मनी नहीं करेंगे, दोस्ती ही करेंगे। शहीदलाइव और दूसरे चार करोस मुसलमान यूनियनमें पड़े हैं, वे सबके सब फरिश्ते तो है नहीं । जैसे ही सब हिन्दू और सिक्ख भी थोड़े ही फरिश्ते हैं ! हममें अच्छे लोग भी हैं, और चुरे भी हैं, लेकिन चुरे कम हैं। हमारे यहाँ हम जिन्हें जरायमपेशा आतियाँ कहते हैं, वे लोग भी पड़े हैं । सुन सक्के साथ मिलजुलकर हमें रहना है । मुसलमान वही कौम है, छोटी कोम नहीं है । यहीं नहीं, सारी दुनिया में मुसलमान पड़े हैं। अगर हम मेसी झुम्मीद करें कि सारी दुनिया के साथ हम मित्र भावसे रहेंगे, तो क्या वजह है कि हम यहाँकै मुसलमानोंसे दुश्मनी करें। मे भविष्यवेत्ता नहीं है, फिर भी मुझे अवरने अकक दी है, मुझे मीश्वरने दिल दिया है । झुन दोनोंको E
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