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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/३९८

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काश्मीरका प्रश्न मेरे पास भेक तार लाहोरसे माया है। काश्मीर-फांडम लीगचे प्रेसिडेण्ट लिखते हैं कि आपने यह तो बुलन्द काम किया है । पर यह कामयाव न होगा, जब तक काश्मीरका मामला तय न हो । हिन्दकी सरकार अपनी फौज कहाँसे हटा के और काश्मीर जिसका है, मुसे मिल जाय । मैं कहता हूँ कि अगर काश्मीरका फैसला न हुआ, तो क्या काश्मीरके हिन्दू, मुसलमान, सिक्स भेक दूसरेके दुश्मन रहेंगे ? हमारी फौजने काश्मीरपर हमला नहीं किया। वह तो तव गर्भी, जब काश्मीरके मुसलमान अनुभा शेख अब्दुल्ला और वहाँके महाराजाने लिखा कि काश्मीर में फौज मेजो, नहीं तो वह गया। यह ठीक है कि काश्मीर जिनका है, सुनको सिके । मगर चिनको १ यहाँसे बाहरके सब लोग निकाल दिये जायें । कोभी भी न रहे, तभी यह हो सकता है । पर महाराजा तो हैं । मुन्हें को निकाल नहीं सकता। जय महाराजा विलकुल निकम्मे हों, तो हीं निकाल सकते हैं। यह जो लिखा है ठीक नहीं है। मे अमी फासे मुठा हूँ। किसीका दुश्मन नहीं । आप आकर अपना केस मुझे समझा दें । 1 ग्वालियर, भावनगर और काठियावाड़को रियासतें ग्वालियर से मुसलमानोंका तार खाया हैं कि हमें बटा, मारा और अनाजकी चाभी भी । यह अगर सही है, तो सबको कहूँगा कि दिल्लीका काम भी आप बिगाडनेवाले हैं और भिवसे हुकूमतको शरमिन्दा होना पड़ेगा | अखवारमें पता है कि काठियावादमें जितने राजा हैं, उन्होंने फैसला किया है कि हम as मिलकर मेक राज करेंगे । यह सही है, तो 1 बहुत बड़ी बात है । न्हें में वधार्थी देता हूँ । भावनगरने पहल की और प्रजा aarti ya सौप दिया । वह धन्यवाद और बधामीके. चायक है । ३७९