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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/४१४

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आकर जमा हो रहा है, भी जितना ही सन्तोष प्रकट किया गया है । यह घड़ी देखनेकी चीज है कि अब बाजार में गुद जरूरत से ज्यादा और गुड़ ही गरीब आदमीकी खुराकम गर्मी देनेवाली चीजके अशको पूरा कर सकता है। गुडके जिन जमा हुने ढेरोंको घटाने या जहाँ गृह बनता है, यहाँसे दूसरी जगह गुरु पहुँचानेकी कोभी सूरत नहीं, अगर तेजीले सामान ढोनका बन्दोवस्त न हो। जिस विषयको खुद समझनेवाले भेक मित्र अपने पत्रमें जो लिखते हैं, वह ध्यान देने लायक है. यह कहने की जरूरत नहीं कि अकुश शुठानेकी नीतिकी सफलताका ज्यादा आधार जिस चीत्रपर ही है कि रेलगाडी या बक्से सामान नकलो-हरकतका ठीक-ठीक वन्दोवस्त किया जाय । अगर रेलसे माल free-सुघर के जानेके तंत्र सुधार न हुब्बा, तो देवाभरमे कहत (अकाल ) फैलने और अकुश झुठानेकी सब योजनाके अस्तव्यस्त हो आनेका डर है । भान जिस तरहसे माल के जानेका हमारा तंत्र चल रहा है, अससे दोनों, अकुश चलाने और अकुत्र ठानेकी नीति सख्त खतरे हैं। हिन्दुस्तान के जुदा जुदा हिस्सोंमे भावोंमें जितना भयंकर फर्क होने की वजह भी माल ठानेके साधनोंकी यह कमी ही है । अगर गुल रोहतकमै आठ रुपये मन और Train feास रुपये मनके , हितासे पिता है, तो यह माफ बताता है कि रेलवे तंत्र हींग है। महीनो तक मालगायेके डिब्बाम सामान नहीं तारा जाता। डिब्दों और कोयलेकी कमी के बहाने और तरह तरहके भालको तरजीह वेनेके बहाने मालगाडीके डिब्बोंपर माल लादनेमें सख्त बेमानी और धूसका शमार गर्म है। भेक डिब्बेको किरायेपर हासिल करनेके लिये सैकड़ों रूपये खर्च करने पडते हैं और कभी कमी दिनों तक स्टेशनोंपर शक मारनी पड़ती है | डिब्बोकी मांग पूरी करने और डिव्योंको चलते रखनेमें ट्रान्सपोर्ट के मन्त्रीको भी अभी तक कुछ चली नहीं। अगर अकुश झूठानेकी नीतिको सफल बनाना है, तो ट्रान्सपोर्टके मंत्रीको रेल और सड़ककी सारीकी सारी ट्रान्सपोर्ट-व्यवस्थाकी फिरसे जाँच- 1 ३९५