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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/४२

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1 सुपनिवेशका यह लाजमी फर्ज है कि वह अपने यहाँके अल्पसंख्यकों को पूरी हिफाजतकी गारण्टी दे । सुनके लिये दो ही रास्ते हैं - या तो वे आपसमें मिल-जुलकर मिस सवालको हल कर लें, या फिर आपसमें लड मरें और दुनियाको अपनेपर हँसनेका मौका दें। हिन्दुस्तानी सघसे गये हुमे मुस्लिम शरणार्थियोंकी मददके लिये फण्ड ञिकट्ठा करनेके बारेमे कायदे आजमने जो जोशीली अपील निकाली है, सुसमें उन्होंने पाकिस्तानमें मुसलमानों द्वारा किये जानेवाले पुरे कामोंका कोभी जिंक नहीं किया । यह ठीक नहीं है । में चाहता हूँ कि दोनों अपनिवेशोंकी सरकारें खुले तौरपर और हिम्मतके साथ अपने यहाँके बहुसख्यकों के चुरे कामोंको स्वीकार करें । 'आसफअली साइव 1 अन्तम में हमारे अमेरिकाके राजदूत आसफअली साहबके खिलाफ किये गये re meet मिसारेका जिक्र करना चाहता हूँ । जबसे मै इन्हें जानता हूँ, तमीसे वे भेक पक्के काप्रेसी रहे हैं। ये इकीम साहब और डॉ० अन्सारीके वैसे ही दोस्त थे, जैसे वे आज मौलाना साहबके दोस्त है । मौलाना साहब कभी बरसों तक काप्रेसके प्रेसिडेन्ट रहे और पक्के राष्ट्रवादीके नामसे मशहूर हैं। मे जानता हूँ कि असफअली साहबको अमेरिकासे बुलाया नहीं गया है, बल्कि ये बहुत अहम सवालों पर प्रधानमन्त्रीसे सलाह-मगविरा करनेके लिये खुद यहाँ आये हैं। यह शरसकी बात है कि भैंसे मुसलमान भी हरमेक हिन्दू और सिक्खके साथ बेखटके न रह सकें । मेक भी मुसलमानका राजधानी दिल्ली में खतरा महसूस करना बुरी बात होगी । 1 १३