जरा भी सहन न करनेवाली सफाभीकी भावनाकी जरूरत है । हिन्दू शरणार्थी-कैम्पोंकी मी बिलकुल यही हालत है । गन्दगी रखना जिस देशकी ही खराबी है, मुसे दुर्गुण कहना ज्यादा अच्छा रहेगा । जिस दुर्गुणको अक आजाद देशके नाते हम जितनी जल्दी हटा सकें, सुतना ही हमारे लिये ठीक होगा । सरकारों और जनताका फर्ज 1 अिन कैम्पोंसे हटकर गाधीजीके विचार मौजूदा सोड-फोड और बरवादीकी तरफ मुडे जो असे पैमानेपर हुआ है कि सने देशकी प्रगतिको रोक दिया है । सुन्होंने सवाल किया -- भितने हिन्दू और सिक्ख पश्चिमके पाकिस्तानी सूर्वोसे भागकर क्यों आ रहे हैं ! क्या हिन्दू या सिक्ख होना कोभी गुनाह है ? या वे महज अपनी जिदके कारण वहति आ रहे है ? या सुनके धर्म-भागियोंने पूर्वमे जो कुछ किया है, सुसकी सजा सुन्हें दी गभी है ? जिसके बाद हिन्दुस्तानी संघके बारेमें सोचते हुमे गाधीजी बोले – दिल्लीके मुसलमान डरकर अपने घर क्यों छोड़ना चाहते है ? क्या दोनों झुपनिवेशोंकी सरकारें खत्म हो गभी हैं ? जनताने अपनी सरकारोंकी ह्युपेक्षा क्यों की? अगर मुसलमानोंके पास बगैर लाभिसेन्सके हथियार हैं, तो यह काम सरकारका है कि बह सुन लोगोंसे भुन्हें छीन लेती, और अगर सरकारने असा करनेकी ताकत नहीं है, तो इसके बजीरोंको अपनेसे ज़्यादा काबिल लोगोंके लिये जगह, साली करनी पडती । सरकार तो, जैसी जनता से बना दे, वैसी ही बनती है । मगर किसी आदमीका अपने हाथमें कानून देना बिलकुल बेजा और लोकशाही के खिलाफ है । यह अराजकता, चाहे वह पाकिस्तान में हो, चाहे हिन्दुस्तानी संघमें, जिससे कमी को भी लाभ नहीं हो सकता । मैं दिल्लीम अपना 'करो या मरो' का मिशन पूरा करनेके लिये ठहरा हुआ हूँ । यह भाभीके हाथों भाभीका खून, यह राष्ट्रीय आत्मघात या खुदकुशी और आपको अपनी ही सरकारको घोखा देते देखनेकी मेरी विलकुल भिच्छा नहीं है। भगवान करे आप फिरसे समझदार चर्ने । १५
पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/४४
दिखावट