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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/४७

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६ जबरदस्ती नहीं १७-९-१४७ गणेश लामिन्तके लम्बे चौड़े अहाते में दिल्ली क्वाथ मिलके नजदूरों और बाहरके दूसरे लोगों की जड मारी मीह जिद्धी हुआ थी । गाधीजी मजदूर भाभियोंकी विनतीपर वहाँ गये थे । जब कभी गाधीनी भंगी- बत्तीनें ठहरते थे, तब ये ही मजदूर झुनकी सेवाके लिये स्वयंसेवकोंका जिन्ताम करते थे। चाहे छह बजे प्रार्थनासभा पहुँचकर गाधीजीने का स्पीकरके जरिये बोलनेकी कोशिश की, लेकिन सुत मशीनमें कुछ खरानी होनेते दूसरी मशीन लगाओ गमी । असने कुछ कम तो दिया, लेकिन सुलको आवाज मितनी तेज नहीं थी कि समाके आखिरी कोने नाभी है। भितपर अक पंजाबी दोस्तने कहा कि मैं गाधीजीका क्षेत्रमेक शब्द अपनी जोरदार आवाज में दुबारा सुनाभूँगा । यह तरकीब काम दे गली । गाधीजीने कहा, क्ल ज्ञानके नेरे अनुभवके बाद मैंने यह तय कर लिया है कि जब तक सभाका अनेक आदमी आर्थना करनेके लिये राजी न हो, तब तक आन प्रार्थना नहीं करूँगा । मैंने मी कोभी sta किमीपर नहीं लादी । तब कि प्रार्थना-जैसी सूत्री मामात्मिक या हामी ची तो मैं सकता हूँ ? प्रार्थना करने या न करनेश नाव दिलके लाद ही कैसे भीतर मिलना चाहिये । जिसमें मुझे न करनेका तो कोनी सवाल ही नहीं शुद्ध सकता 1 मेरी प्रार्थनासभायें सचमुत्र जनप्रिय सुनते लाखो भादमियोंको फायदा खिंचाव के समय में great नमी हैं। नाम होता है कि पहुँचा है, लेकिन मित आपसी गुस्तेको त सक्ता हैं, जिन्होंने मडी बडी मुसीबतें नही है । ौ प्रार्थना करनेत्री भर्त यही है कि खुला जो मान किसीको तरानके लायक मालूम हो, सुसे होनेकी मुझसे माचा न रबी वाय। या तो प्रार्थना सी है वैसी ही दिलसे स्वीकार १८