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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/७१

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वनता- विराटता नहीं । क्यरकी तरह गुरु नानककी भी यही कोशिश रही कि सारे धर्मोका समन्वय हो । मैंने वह भजन सबको सुनानेके खयालसे लिख लिया था, मगर यहाँ लाना भूल गया । कल झुसे लाग गाँधीजीकी अभिलाषा 1 लाहोरके पण्डित ठाकुरदत्त मेरे पास आये और झुन्होंने मुझे अपनी दुखमरी कहानी सुनामी । अपनी हालत बयान करते हुये में रो पडे । मुन्हें लाचार होकर छाहोर छोड़ना पड़ा था । सुन्होंने मुझसे कहा कि 'आपने पाकिस्तानमे अपनी जगहपर मर जाने मगर गुण्डोंसे घठाकर न भागनेकी जो सलाह दी है, मुझे मे पूरी तरह मानता हूँ । मगर सुपर अमल करने की ताकत मुझमे नहीं थी । अब ये चाहता हूँ कि वापिस लाहोर चला आयूँ और मौतका सामना करूँ। मै नहीं चाहता था कि वे भैसा करें । मैंने अनसे कहा कि आप और दूसरे हिन्दू और सिक्ख दोस्त, दिल्लीमे फिरसे सच्ची शान्ति कायम करनेमें मुझे मदद दें। तब मे नभी ताकत के साथ पश्चिम पाकिस्तानकी तरफ बढ़ेगा । मै लाहोर, रावलपिण्डी, शेखपुरा और पश्चिम पजाबकी दूसरी जगहोंने जाऊँगा । मे सरहदी सूवे और विधमें भी जागूँगा । मैं सबका सेवक और भला चाहनेवाला हैं। मुझे विश्वास है कि कोभी मुझे कही भी जानेसे न रोकेगा । और में फौजकी हिफाजतमे नहीं जागूँगा । मे अपनी जिन्दगी लोगोंके हाथमें रख दूंगा 1 जो हिन्दू और सिंक्ख पानिस्तानले खदेय दिये गये हैं इनमेंसे हरयेक जद तक अपनेअपने घरोंको भिजतके साथ नहीं छोड़ता, तब तक में चैनकी साँस नहीं लूँगा । शर्म की बात पण्डित ठाकुरदच भेक मशहूर वैद्य हैं। कभी मुसलमान शुनके मरीज और दोस्त हैं, जिनका वे सुफ्त मिळान करते रहे हैं। यह रमकी बात है किन्हें भी लाहोर छोड़ना पड़ा। भिसी तरह हकीम भजमलसने दिल्ली में हिन्दू और मुसलमानोंकी भेकसी सेवा की थी। सुन्होंने तिब्निया कालेज शुरू किया जिसका शुद्घाटन मैने किया था । अगर हकीम अजमलखाके वारिसोंको दिल्ली और तिब्बिया कालेज छोड़ना નર્