मददपर जरा भी निर्भर रहे, तो हो सकता है कि अपने देशके भीतर ही अपनी जरुरतका अनाज पैदा करनेकी जो जबरदस्त कोशिग हमें करनी चाहिये, सुनते हम वहन जायें। जो परती जमीन खेतीके राममें लाभी का नरती है, झुसे इन जहर जिस काम लें । केन्द्रीकरण या विकेन्द्रीकरण मुझे भय है कि खानेपानेकी चीजोंको अक जगह जमा करके, वहाँते सारे देश सुन्हं पहुँचानेश तरीका नुकसानदेह है। विकेन्द्रीकरणके 'जरिये हम आसानीसे काले बाजाको खतम कर सकते हैं और चीजोंको यहाँमे यहाँ लाने सेजाने में लगनेवाले वक्त और पैसेकी बचत कर सकते है । हिन्दुस्तानके अनाज पैदा करनेवाले देहाती लोग अपनी फसलको नहीं वगैरा से यचानेकी तरकीयें जानते हैं । अनाजको भेक स्टेशनसे दूसरे स्टेशन लाने-लेजानेम चूहों वगैराको असे स्वानेका काफी मौका मिलता है। जितले देशका रो रुपयोका नुकसान होता है और अब हम ओक छटाक अनाजके लिये तरसते हैं, तब देशका हजारों मन अनाज जिम तरह बरबाद हो जाता है । अगर हरओक हिन्दुस्तानी जहाँ नविन हो वहाँ अनाम पैदा करनेकी जरुरतको महसूस करे, तो शायद हम भूलना कि देश कमी अनाजकी तंगी थी। ज्यादा अनाज पैदा करनेका विषय मा है, जिसमें सबके लिये आकर्षण है। लिय विषयपर में पूरे विस्तार के साथ तो नहीं घोल सका, मगर मुझे सुम्मीद है कि मेरे जितना कहनेसे आप लोगोंक मनमें जिसके बारेमें चिपंग हुभी होगी और सममदार लोगोका ध्यान जिस चातकी तरफ मुा होगा कि हरनेक त्रल्स जिस तारीफके लायक काम में मदद कर सकता है । अनाजकी कमीका किस तरह सामना किया जाय ? अब में आपको यह बता दूँ कि बाहरसे हमको मिलनेवाले तीन फीसदी अनाजको ऐनेसे मिन्कार करनेके बाद इम किस तरह अिस कमीको पूरा कर सकते हैं । हिन्दू लोग महीने में दो वार अकादशीका व्रत रखते हैं । मिस दिन वे आघा था पूरा मुफ्वास करते हैं । ७१
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