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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/९९

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मुसलमान और दूसरे फिरको लोगोको भी, खान करके जब करोड़ों भूखों मरते लोगोंके लिये मेकअप दिनका अपवास करना पड़े, तो जिसकी सुन्हे मनाही नहीं है । अगर सारा देश मिस तरहके सुपवासकी अहमियत को समझे, तो हमारे सुद होकर विदेशी अनाज लेनेसे जिन्कार करनेके कारण जो कमी होगी, सुमसे भी ज्यादा कमीको वह पूरी कर सकता है । मेरी अपनो रायनें तो अगर अनाजके रेशनिंगस को झुपयोग है भी, तो वह बहुत कम है । अगर पैदा क्लांको झुनकी मर्जीपर छोड दिया जाय, तो वे अपना अनाज बाजारनें लायेंगे और हरभेक्ते अच्छा और खाने लायक अनाज मिलेगा, जो भाज आसानीसे नहीं मिलता । प्रेसिडेण्ट ट्रूमेनकी सलाह अनाजको वर्गीके बारेनें अपनी बात खतम करनेते पहले मे आप लोगोंका ध्यान प्रेसिडेण्ट डुमेको अमेरिकन जनताको दी गभी त सलाहकी तरफ दिल्लागा, जिसमें सुन्होंने कहा है कि अमेरिकन लोगोंको कम रोटी खाकर यूरोपके भूखों नरते लोगोंके लिये अनाज बचाना चाहिये । सुन्होंने आगे कहा है कि अगर अमेरिकाके लोग खुद होकर जिस तरहका पजाम करेंगे, तो सुनकी तन्दुरस्ती को कभी नहीं मायेगी । प्रेसिडेण्ट डुमेनको सुनके मिल परोपकारी रसपर मै बधाओं देता हूँ। मैं भित्र सुझावको नाननेके लिये तैयार नहीं हूँ हि जित परोपकारके पीछे अमेरिकाके लिये माती फायदा जुठाने चन्दा जिरावा छिपा हुआ है। किसी भिन्नानका न्याय "झुसके कानपरसे होना चाहिये, सुनके पीछे रहनेवाले जिरादेते नहीं । अक भगवानके सिवा और कोभी नहीं जानता कि जिन्सानके दिलमें क्या है । अगर अमेरिका भूसे यूरोपको अनाज देनेके लिये सुपवात करेगा या कम खायेगा तो क्या यह काम हम अपने खुदके लिये नहीं कर सको अगर बहुत से लोगोंका भूखसे मरना विचित है, तो हमें स्वावलम्वनके तरी सुनको बचानेकी पूरीपूरी कोशिश करनेश का तो कनसे कन ले ही देना चाहिये । जिससे ओक राष्ट्र चा झुठा है। co