पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/१०६

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          उषा चरित्र।
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            चौपई।

विदुर देस प्रोणतपुर गांउं। बानासुर राजा को नाउं॥ तास कुंवरि उपा है सुंदरी। रूपवंत अति सब गुन भरी ॥ तिहिं नृपति सों कहै लउकाई। जुदा महल मोहि देख कराई। महल अनूप बन्या अति भारी। सषी चतुरि राषी रषुवारी ॥ असी सहस जोध्या रषवारे। अति सुजान नृप राज दुलारे॥

            दोहरा। 

सुष सोवत नहिं सुंदरी सुपनै निरषि कुंवार। भई प्रीति उर द्रिगन मिलि बिधना लिषी लिलार ॥

           चौपई। 

उहिं नरैंन उनि सुपना देषा। कुंवरि प्रीति तिहुँ लोक बिसेषा । भयो प्रात कछु कही न जाई। उषा कुंवर के रूप अंघाई ॥ तन सों तन मन सों मन हीया। चार पहर सुष उषा किया। कुंवरि रही छबि देषि लुभाई। अनुरुद्ध देषि परया मुरझाई ॥ कौंन भांति बिधि किया संजोग। अब बिछुर नहीं होय बियोग।