पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/११४

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.. stu जिलि तोहि प्रीति की है पीरा। तिलि गहि लाउं तुमरे तीरा ॥ मन चिंता करि टूरि कुंवारा। ल्याउं अाज सुपने की बारा ॥ षोलि नेन तब बदन उचारा। कोन ठावं कई ते पम धारा ॥ सेला। कांवर जुचित क्याकुल बिकल प्रान सुंदरी पास। तब टूती के बचन सुनि भई कुंवर को श्रास ॥ चोपई। तब दि कुंवर टूती सों बोले। प्रान कपट लीये कर षोले। पठई कौन कहां तें पाई। कोन सषी तू जान पठाई। कॉन नगर तू बसा कुंवारी। अति चातुरि तोहि देषों भारी ॥ कले कुंवरितू सन हिं सहेली। मेरे प्रान अटक पर बेली॥ सुपने मे देषी सुकुमारी। लाय प्रीति दीमा टुष भारी ॥ चित्ररेष स्स्सी मन माही। छल कर लेहुं कुंवर गदि वांही॥ उठो कुंवर तुम चलो गुताई। मिलनु अाज प्रीतम केतांहीं। बचन लेल मो पास कुंवारू। सुपने साथ मिलाउं गारू सोमा। बचन सत्ति हों बोलिलों सो तुम्हारो काज । सो सुपना तुम देषिया ताहि मिलाउं ग्राम ॥ चौपई। लसि बोला तब राजकुंवारू । म तुम बीचि येक कस्तारू॥ कहो भेद तुम मोहि कुंवारू। कीन नगर में प्रेम पियारू ॥ सत्ति बचन तू बोलि कुंवारी। बन पखत सब ठोर स्मारी ॥