पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/१२८

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महाभारत। - - शकुन्तलोपाख्यानं। रोलाछन्द। बेसंपायन उवाच। भयो पोख बंश मे दुषन्त भूप महान। की सागर अन्त लों बश भूमि सब सुखदान ॥ बंश सर लोत नहि करत कोउ पाप। सबिधि पालत प्रजा सिगरी भरो परम प्रताप ॥ धर्मस्त धर्मार्थ पावत प्रजा जेलि के राज । चोर भय को सुधा भय को मिटो लेतु दराज ॥ वर्ण मत स्वधर्म मे सब बिना भय संचार। . समय ललि परजन्य बर्षत सरस सश्य भार॥ भई स्त्र समृद्ध भू अति मुदित जन गण सर्व। भए विप्र स्वधर्मस्त नहि अनृत बोलत खर्ब ॥ भूप बज्र समान तन को युबा अति मतिमान।