पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/३२

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॥१६॥ . मंजार को बासु दीयो बुटो गीधु मायो। ईह सुनि दोऊ पुछत हैं प्रगु अरु स्यारु ईह केसी कथा है। तब काग कहितु है। भागीरथी गंगा के तीर निधकट नाम एक पखत रहे गीधर लोक प्रसिध। तहां ग्रीध परबत मै एक बडो पापरि को रुष रहे। ता के षोटर में श्रांधरी बुटो एक गीध रहे। तहां वा के जीवनि निमति और पंछी श्रापने चार में थोरो थोरो प्रहार बाटि देहि ता तें वह गीध जीवे। तहां एक समये दीर्घकरण माम मंजार पंछिन्द के बालकन्ह षावे को प्रायो। मंजार को श्रावत देषि सब ही पंछी उराने उरतें पुकारन लागे। ऊन को पुकारिवो सुनि गीध यह कहि । को प्रावत है। तब दीर्घकरण मंजार गीध को देषि उरानों उस्ते भाजि छ न सक्यो उहि गीध के निकटि गय्यो जाई गीध सों ईह कही जू तुम बड़े हो हमारे प्रणांमु है। तब गीधू कहितु कोंन है। ऊन कही ठं दीर्घकर्ण नाम बिलाव हों। तब गीध बोल्यो तु दुरि हि रहि नांतर तोहि मारिहों। तब मंजार कहि मेरे बचन सुनहुँ पीछे जे मावि कु जुक्त हुँ तो मारिय्यो। जाते जाति ही ते न कोउ मारिये न पुजिये व्योवहार देषि जु जैसो होई तेसो हि करिये जो माखि जोग्य होई तो मारिये पुजिवे लाई कहोई तो पुजिये। तब गीध बोल्यो कहि सु । मंजार कहितु है गीध राजा में इह गंगा जी के तीर असनान करि मांस छाति ब्रह्मचर्य सों चंद्रायण ब्रत करत हों मेरे आगे सब पंछि मिलि तुम को धर्मातमा कहि स्तुति करत है तातें तुमें म्यांनी जांनिकरि धर्म सुनिवे कू तुम पासि पायो हों तुम ऐसे धर्मात्मा हो जु अतिथ को मारिवे को ऊठे लो। मल्सथ को ईद धर्म है जो सत्रु घरि श्रावे तो मित्रं कु की पुजा