पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/६५

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॥४ ॥ सुमे को बड़ी भीर होने लगी। पातसाह ने यह ख बुलाइ बूझयो कहा पाठ करे है जो इतनी भीर हो । बिंद। पातसाद ने कयो और लोग तू तो पाठ । भीर नहीं हो है। इन कही हजरत जो तोता सत्य 'सुने नहीं जाहि कोवा जो कले तो सब कोउ अचा जाहि। जयदेव ठाकुर के राजभोग केलेत रामत करि कहूं तेर स्ले मारग में ठग मिले। इन पूथ्यो तुम सब कहां कझो जहां तुम जावगे तहां हम ढूं जाहिगे। संगी हैं सो थेली ठगनि के हाथ पकराइटई। ठग में करने लगे हमारे सब तो ठग लुते ही पर यह हम र या समें दाउं बचाइ गांव में जाइ हाकिम के पास ' कियो चाहिये। एक ने कन्यो भारि गरो। टूसरे । को धन लीजिये ता को मारिये नहीं। तीसरे ने कर काटि गड़ले में राखि देख न कहूं जाय सकेगी न । कियो। ऐसे में कोउ राजा अाइ निकयो गड़हे की चंद्रमा को प्रकाश देखि तहां जाइ जयदेव पर निहा ते वा की बुद्धि निर्मल के गई। पालकी पे चहाइ र ढूंठ नीको करयो। पुनि तिन सों पूथ्यो में उचि करिये। तिन कल्यो लरि साधु सेवा करो। राजा ही कान लाग्यो। केते दिन बीते ठग सब ने राः। को खबर पाइ माला तिलक धास्न करि तहां था!