पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/७४

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॥५ ॥ जयदेव। मूल। जयदेव कबि नृप चक्रावे खर मंडलेश्वर प्रानि कबि । प्रचुर भयो तिहुँ लोक गीतगोबिंद उजागर। कोक काव्य नव स सरस सिंगार को सागर॥ अष्टपदी अभ्यास करे तिहिं बुद्धि बहावे। राधा रमण प्रसंग सुनत तहां नि आवे॥ संत सरोरुह खर को पना पति सुष जनक रबि। जयस्व कबि नृप चकवे वंउ मंउलघर प्रानि कबि॥ जेदेव की टीका। किविल्व ग्राम ता में भवे कबि राज राज भयो रस राज लिये मन मन चाषिये। दिन दिन प्रति रूष रूप तर जाय रहे गहे एक गूदरी कमंडल को राषिये। कहि देवे विप्र सुता जगनाथ देव जू को भयो वा को समें चल्यो देन प्रभु भाषिये। रसिक जेदेव नाम मेरोई सरूप ताहि देवो ततकाल अहो मेरी कहि साषिये। चल्यो द्विज तहां जहां बैठे कबि राज राज अहो महाराज मेरी सुता यह लीजिये। कीजिये बिचारि अधिकार बिसतार जाके ताही को निहारि सुकुवार इह दीजिये। जगनाथ देव जू की अाम्या प्रतिपाल करो टरो मति धरो लिये नातो दोस भीजिये। उन को हजार सो है लम को पहार एक तातें फिरि जावो तुमे कहा कहि षीजिये। सुता सौ कल्त तुम बैठी रहो याही ठोर प्राशा सिर मौर मेरे नाही जाति टारी है। चल्यो अन पाय