पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/७७

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॥६॥ बार बिदा राजा नही जान देत अति अकुलाये करें : जिये । देके बलु भांति सो पठाये संग मानस / श्रावो । पर रीझिये। पूछे नृप नर कोउ तुमरी न सखर जिरं . सेवा नही भई है। स्वामी जू सों नातो कहा कहों । षियो दुराय यह बात अति नई है । लुतो ईक ठौर ना । इनि कियोई बिगार मारि गरी प्राप्ता दई है। राखे । निदान लाथ पाव वाही के दिसा न अब हम भरि । भूमि सब ठग वे समाय गये भये ये चकित दोरि स्वार । कही जिती बात सुनि गात गात कापि उठे हाथ पां : के त्यों सुलाये है। अचिरज होऊ नृप पास जाय प्र ! यह सुनि आये वाही ठौर धाये है। पूछे बार बार । धारि स्ले कलिये उघारि केसे मेरे मन भाये है। राज ! कही सब बात षोलि निपट अमोल यह संतनि के । अपकार करो तउ उपगार करे टरे रीति प्रापनी ही ! साधुता न तजे कभू जेसे दुष्ट दुष्टता न यही जानि । नरेस है। जान्यो जब नांव ठाव हो इहां बलि जां : प्रेम भक्ति भई सहे। गयो जा लिवाय लाय कबि राज : ले मिलाय श्राय एनी किंग पाई है। मयो एक भ भी जाई सती को अंग काटि कोड कूदि परी था। नृप बधू निपट अचंभो भयो इनि के न भयो फिा : है। प्रीति की न रीति यह बडी बिपरीति अहो छूटे । प्रान छूटि जाइ है। ऐसी एक पाय कलि राजा सों यह