पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/७८

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॥६॥ जावो बाग स्वामी नेक देषी प्रीति को। निपट बिचारी मुरी देत मेरे गरे खुरी तिया ल मान की वैसे ही प्रतीति को। प्रानि कहे चाय पाये कही यही भांति श्राय बैठी किंग तिया देषि लोटी गई रीति को। बोली भक्त बधू अतू वे तो के बलुत नोक तुम कहा श्रोचक ही पावत को भीति को। भई लाज भारी पुनि फेरिके संवारी दिन बीति गये केउ जब तब वही कीनी है। जानि गई भक्त बधू चारुति परीक्षा लियो कही बाजु पाये सुनि तजी देह भीनी है। भयो मुष सेत रानी राजा प्राये जानी यह रची चिता जरों मेरी भई मति होनी है। भई सुधि आप को सु ाये बेगि दोरि इहां देषि मृत्यु प्राय नृप कयो मरी दोनी है। बोल्यो नृप वासू सो लि जई बनत अब सब उपदेस लेके धूरि मे बहाया है। कयो बलु भांति ऐ पे नावति न सांति किलु गाई अष्टपदी सुर दियो तन जायो है। लाजनि को मायो राजा चाहे अपघात कियो जियो नहिं जात भक्ति लेस ठूत श्रायो है। करी समाधान निज याम पाए किंटुविल्व जैसो कछु सुन्यो यह परचे ले गायो है। देवध्वनि सोत हो अठारे कोस त्राप्रम ते सदाई मान करे घरे जोग ताई को। भयो तन वृद्ध तलु छोडे मही नित्य नेम प्रेम देषि भारी निसि कही सुषदाई की। आवो जिनि ध्यान को मति हठ ऐसी मानी नही पाउं में ही जानों केसे भाई को। फूले देषो कंन जब कीजिये प्रतीति मेरी भई वही भांति सेवे अबलों सुहाई को॥