पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/८७

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॥७॥ जायकरि लाईये। विषई बनिक एक देषिके बुलाय लई कही सही निसि भाईये । भोजन करत मांझ पीपा व बारे तन प्रान जब कहिके जनाईये । करिके सिंगार सीत मेह अायो कांधे पे चलायें वपु बनिया रिझाइये । हाट द्वार श्राप बेठि रहे चहे सूके पग माता केसें करि बाई हो लिवाय लाये कहां है निहारो जाय पाय पाय पखो ठखें साई हो। मानों जिनि संक काज कीजिये निसंक धन अंक जा पे लो मरे भाई है। मखो लाज भार चाहे धयो सृग बहे नीर धार देषि दई दीक्षा पाई है। चलत चलत अवन परी भरी सभा बिप्र कहे बडी बिपरीति है। भूप । निपट घटाई लोत भक्ति सरसाई नही जानें घटी प्रीति के बोध देन द्वार ही ते सुधि ई लई सुनि कही आवो करो। बडो मूल राजा मोजा गांठें बैठ्यो मोची घर सनि दौरि अ कोन रीति है। कृती घर मांझ बांझ रानी एक रूपवर्त ल्यावो बेगि चल्यो सोच भारी है। उगमग पांव धरे पीर करे ठाको देषि उरे इत नावे श्राप धारी है। जाय तो: तिया ठिग सुत नयो भयो भूमि पर कला जानी न निहार सरूप निज षिझिके प्रसंग कच्छो कलां वनं रंग सिष्य भट है। कियो उपदेस नृप हदे मे प्रवेश कियो लियो वर आये निज धाम है। बोल्यो एक नांव साधु एक निरि लेवो वही भागो संग भागी सीता बाम है। प्रात भये चं ही की ग्राम्या प्रभु चल्यो छांउि आगे घर घर देषी मार