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शिक्षा

देखा कि अभयका पाठ उसने सिर्फ़ ज़बानी ही किया था। उसने लाठी छोड़ी और वह निर्भय-निडर बना।

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शिक्षा

पाठक : आपने इतना सारा कहा, परन्तु उसमें कहीं भी शिक्षा-तालीमकी ज़रूरत तो बताई ही नहीं। हम शिक्षाकी कमीकी हमेशा शिकायत करते रहते हैं। लाज़िमी तालीम देनेका आन्दोलन हम सारे देशमें देखते हैं। महाराजा गायकवाड़ने (अपने राज्यमें) लाज़िमी शिक्षा शुरू की है। उसकी ओर सबका ध्यान गया है। हम उन्हें धन्यवाद देते हैं। यह सारी कोशिश क्या बेकार ही समझनी चाहिये?

संपादक : अगर हम अपनी सभ्यताको[१] सबसे अच्छी मानते हैं, तब तो मुझे अफसोसके साथ कहना पड़ेगा कि वह कोशिश ज्यादातर बेकार ही है। महाराजा साहब और हमारे दूसरे धुरन्धर[२] नेता सबको तालीम देनेकी जो कोशिश कर रहे हैं, उसमें उनका हेतु निर्मल है। इसलिए उन्हें धन्यवाद ही देना चाहिये । लेकिन उनके हेतुका जो नतीजा आनेकी संभावना है, उसे हम छिपा नहीं सकते।

शिक्षा : तालीमका अर्थ क्या है? अगर उसका अर्थ सिर्फ़ अक्षरज्ञान ही हो, तो वह तो एक साधन जैसी ही हुई। उसका अच्छा उपयोग भी हो सकता है और बुरा उपयोग भी हो सकता है। एक शस्त्र[३] से चीर-फाड़ करके बीमारको अच्छा किया जा सकता है और वही शस्त्र किसीकी जान लेनेके लिए भी काममें लाया जा सकता है। अक्षर-ज्ञानका भी ऐसा ही है। बहुतसे लोग उसका बुरा उपयोग करते हैं, यह तो हम देखते ही हैं। उसका अच्छा उपयोग प्रमाणमें[४] कम ही लोग करते हैं। यह बात अगर ठीक है तो इससे यह साबित होता है कि अक्षर-ज्ञानसे दुनियाको फायदेके बदले नुकसान ही हुआ है।

  1. तहजीब।
  2. बहुत बड़े।
  3. औज़ार।
  4. मुकाबिलेमें।