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शिक्षा


और जो दूसरोंको अपने जैसा मानता है। ऐसा आदमी ही सच्चा शिक्षित (तालीमशुदा) माना जायगा, क्योंकि वह कुदरतके कानूनके मुताबिक चलता है। कुदरत उसका अच्छा उपयोग करेगी और वह कुदरतका अच्छा उपयोग करेगा।" अगर यही सच्ची शिक्षा हो तो मैं कसम खाकर कहूँगा कि ऊपर जो शास्त्र मैंने गिनाये हैं उनका उपयोग मेरे शरीर या मेरी इन्द्रियोंको बसमें करनेके लिए मुझे नहीं करना पड़ा। इसलिए प्रायमरी-प्राथमिक शिक्षाको लीजिये या ऊंची शिक्षाको लीजिये, उसका उपयोग मुख्य बातमें नहीं होता। उससे हम मनुष्य नहीं बनते-उससे हम अपना कर्तव्य[१] नहीं जान सकते।

पाठक : अगर ऐसा ही है, तो मैं आपसे एक सवाल करूँगा। आप ये जो सारी बातें कह रहे हैं, वह किसकी बदौलत कह रहे हैं? अगर आपने अक्षरज्ञान और ऊंची शिक्षा नहीं पाई होती, तो ये सब बातें आप मुझे कैसे समझा पाते?

संपादक : आपने अच्छी सुनाई। लेकिन आपके सवालका मेरा जवाब भी सीधा ही है। अगर मैंने ऊँची या नीची शिक्षा नहीं पाई होती, तो मैं नहीं मानता कि मैं निकम्मा आदमी हो जाता। अब ये बातें कहकर मैं उपयोगी बननेकी इच्छा रखता हूँ। ऐसा करते हुए जो कुछ मैंने पढ़ा उसे मैं काममें लाता हूँ; और उसका उपयोग, अगर वह उपयोग हो तो, मैं अपने करोड़ों भाईयोंके लिए नहीं कर सकता,सिर्फ़ आप जैसे पढ़े-लिखोंके लिए ही कर सकता हूँ। इससे भी मेरी ही बातका समर्थन[२] होता है। मैं और आप दोनों गलत शिक्षाके पंजेमें फँस गये थे। उसमें से मैं अपनेको मुक्त हुआ मानता हूँ। अब वह अनुभव मैं आपको देता हूँ और उसे देते समय ली हुई शिक्षाका उपयोग करके उसमें रही सड़न मैं आपको दिखाता हूँ।

इसके सिवा, आपने जो बात मुझे सुनाई उसमें आप गलती खा गये, क्योंकि मैंने अक्षर-ज्ञानको (हर हालतमें) बुरा नहीं कहा है। मैंने तो इतना ही कहा है कि उस ज्ञानकी हमें मूर्तिकी तरह पूजा नहीं करनी चाहिये। वह हमारी कामधेनु[३] नहीं है। वह अपनी जगह पर शोभा दे सकता है। और वह


  1. फ़र्ज।
  2. ताईद।
  3. मनचाहा देनेवाली गाय।