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हिन्द स्वराज्य


जब पुख्ता (पक्की) उम्रके हो जायं तब भले ही वे अंग्रेजी शिक्षा पायें, और वह भी उसे मिटानेके इरादेसे, न कि उसके ज़रिये पैसे कमानेके इरादेसे। ऐसा करते हुए भी हमें यह सोचना होगा कि अंग्रेजीमें क्या सीखना चाहिये और क्या नहीं सीखना चाहिये। कौनसे शास्त्र पढ़ने चाहिये, यह भी हमें सोचना होगा। थोड़ा विचार करनेसे ही हमारी समझमें आ जायगा कि अगर अंग्रेजी डिग्री लेना हम बन्द कर दें, तो अंग्रेज हाकिम चौकेंगे।

पाठक : तब कैसी शिक्षा दी जाय?

संपादक : उसका जवाब ऊपर कुछ हद तक आ गया है। फिर भी इस सवाल पर हम और विचार करें। मुझे तो लगता है कि हमें अपनी सभी भाषाओंको उज्ज्वल-शानदार बनाना चाहिये। हमें अपनी भाषामें ही शिक्षा लेनी चाहिये-इसके क्या मानी है, इसे ज्यादा समझानेका यह स्थान नहीं है। जो अंग्रेजी पुस्तकें कामकी हैं, उनका हमें अपनी भाषामें अनुवाद करना होगा। बहुतसे शास्र सीखनेका दंभ और वहम हमें छोड़ना होगा। सबसे पहले तो धर्मकी शिक्षा या नीतिकी शिक्षा दी जानी चाहिये। हरएक पढ़े-लिखे हिन्दुस्तानीको अपनी भाषाका, हिन्दूको संस्कृतका, मुसलमानको अरबीका, पारसीको फ़ारसीका और सबको हिन्दीका ज्ञान होना चाहिये। कुछ हिन्दुओंको अरबी और कुछ मुसलमानों और पारसियोंको संस्कृत सीखनी चाहिये । उत्तरी और पश्चिमी हिन्दुस्तानके लोगोंको तामिल सीखनी चाहिये। सारे हिन्दुस्तानके लिए जो भाषा चाहिये, वह तो हिन्दी ही होनी चाहिये। उसे उर्दू या नागरी लिपिमें लिखनेकी छूट रहनी चाहिये। हिन्दू-मुसलमानोंके संबंध ठीक रहें, इसलिए बहुतसे हिन्दुस्तानियोंका इन दोनों लिपियोंको जान लेना ज़रूरी है। ऐसा होनेसे हम आपसके व्यवहारमें अंग्रेजीको निकाल सकेंगे।

और यह सब किसके लिए ज़रूरी है? हम जो गुलाम बन गये हैं उनके लिए। हमारी गुलामीकी वजहसे देशकी प्रजा गुलाम बनी है। अगर हम गुलामीसे छूट जायं, तो प्रजा तो छूट ही जायगी।

पाठक : आपने जो धर्मकी शिक्षाकी बात कही वह बड़ी कठिन है।