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छुटकारा


ऐसा कहना ठीक नहीं है। और साधारण विचार करनेसे भी हमें लगेगा कि 'अंग्रेजोंके बिना आज तो हमारा काम चलेगा ही नही.' ऐसा कहना अंग्रेजोंको अभिमानी बनाने जैसा होगा।

अंग्रेज बोरिया-बिस्तर बांधकर अगर चले जायेंगे, तो हिन्दुस्तान अनाथ हो जायगा ऐसा नही मानना चाहिये। अगर वे गये तो संभव है कि जो लोग उनके दबावसे चूप रहे होंगे वे लड़ेंगे। फोड़ेको दबाकर रखनेसे कोई फायदा नही। उसे तो फूटना ही चाहिये। इसलिये अगर हमारे भागमें आपसमें लड़ना ही लिका होगा तो हम लड़ मरेंगे। उसमे कमज़ोरकों बचानेके बहाने किसी दूसरेको बीचमें पड़नेकी ज़रूरत नहीं है। इसीसे तो हमारा सत्यानाश हुआ है। इस तरह कमज़ोरको बचाना उसे और भी कमज़ोर बनाने जैसा है। मॉडरेटोंको इस बात पर अच्छी तरह विचार करना चाहिये। इसके बिना स्वराज्य नहीं प्राप्त हो सकता। मैं उन्हें एक अंग्रेज पादरीके शब्दोंकी याद दिलाऊंगा: "स्वराज्यमें अंधाधुंधी बरदाश्त की जा सकती हैं, लेकिन परराज्यकी व्यवस्था[१] हमारी कंगालीको बताती है।" सिर्फ़ उस पादरीके स्वराज्यका और हिन्दुस्तानके स्वराज्यका अर्थ अलग है। हम किसीका भी जुल्म या दबाव नहीं चाहते-चाहे वा गोरा हो या हिन्दुस्तानी हो। हम सबको तैरना सीखना और सिखाना है।

अगर ऐसा हो तो एक्स्ट्रामिस्ट और मॉडरेट दोनों मिलेंगे-मिल सकेंगे-दोनोंको मिलना चाहिये;दोनोंको एक-दूसरेका डर रखनेकी या अविश्वास करनेकी ज़रूरत नही है।

पाठक: इतना तो आप दोनो पक्षोंसे कहेंगे।परन्तु अंग्रेजोंसे क्या कहेंगे?

संपादक: उनसे में विनयसे कहूंगा कि आप हमारे राजा ज़रूर है।आप अपनी तलवारसे हमारे राजा हैं या हमारी इच्छासे, इस सवालकी चर्चा मुझे करनेकी ज़रूरत नहीं।आप हमारे देशमें रहें इसका भी मुझे द्वेष[२] नहीं है। लेकिन राजा होते हुए भी आपको हमारे नौकर बनकर रहना होगा। आपका कहा हमें नहीं, बल्कि हमारा कहा आपको करना होगा। आज तक आप इस

  1. बन्दोबस्त।
  2. डाह, ईर्ष्या, बैर।