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छुटकारा

(४) जो वकील होकर वादी-प्रतिवादी-मुद्दई और मुद्दालेह–के झगड़ोंमें नहीं पड़ेगा, अदालतोंको छोड़ देगा और अपने अनुभवसे दूसरोंको अदालतें छोड़नेके लिए समझायेगा।

(५) जो वकील होते हुए भी जैसे वकालत छोड़ेगा वैसे न्यायाधीशपन[१] भी छोड़ेगा।

(६) जो डॉक्टर होते हुए भी अपना पेशा छोड़ेगा और समझेगा कि लोगोंकी चमड़ी चोंथनेके बजाय बेहतर है कि उनकी आत्माको छुआ जाय और उसके बारेमें शोध-खोज करके उन्हें तंदुरुस्त बनाया जाय।

(७) जो डॉक्टर होनेसे समझेगा कि खुद चाहे जिस धर्मका हो, लेकिन अंग्रेजी बैदकशालाओं-फार्मसियों-में जीवों पर जो निर्दयता की जाती है, वैसी निर्दयतासे (बनी हुई दवाओंसे) शरीरको चंगा करनेके बजाय बेहतर है कि शरीर रोगी रहे।

(८) जो डॉक्टर होने पर भी खुद चरखा चलायेगा और जो लोग बीमार होंगे उन्हें उनकी बीमारीका सही कारण बताकर उसे दूर करनेके लिए कहेगा; निकम्मी दवाएं देकर उन्हें गलत लाड़ नहीं लड़ायेगा। वह तो यही समझेगा कि निकम्मी दवाएं न लेनेसे बीमारकी देह अगर गिर भी जाय, तो उससे दुनिया अनाथ नहीं हो जायगी, और यही मानेगा कि उसने बीमार पर सच्ची दया की है।

(९) जो धनी होने पर भी धनकी परवाह किये बिना अपने मनमें होगा वही कहेगा और बड़े-से-बड़े सत्ताधीशको भी परवाह न करेगा।

(१०) जो धनी होनेसे अपना रुपया चरखे चालू करनेमें खरचेगा और खुद सिर्फ़ स्वदेशी मालका इस्तेमाल करके दूसरोंको भी ऐसा करनेके लिए बढ़ावा देगा।

(११) दूसरे हर हिन्दुस्तानीकी तरह जो यह समझेगा कि यह समय पश्चात्तापका,[२] प्रायश्चित्तका[३] और शोकका[४] है।

(१२) जो दूसरे हर हिन्दुस्तानीकी तरह यह समझेगा कि अंग्रेजोंका क़सूर निकालना बेकार है। हमारे कसूरकी वजहसे वे हिन्दुस्तानमें आये, हमारे

  1. जजी।
  2. अफ़सोस, पछतावा।
  3. कफ़्फ़ारा।
  4. मातम।