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छुटकारा

पाठक : सब ऐसा कब करेंगे और कब उसका अंत आयेगा?

संपादक : आप फिर भूलते हैं। सबकी न तो मुझे परवाह है, न आपको होनी चाहिये। 'आप अपना देख लीजिये, मैं अपना देख लूंगा' -यह स्वार्थ-वचन माना जाता है, लेकिन यह परमार्थ-वचन भी है। मैं अपना उजालूँगा–अपना भला करूँगा, तभी दूसरेका भला कर सकूँगा। अपना कर्तव्य[१] मैं कर लूँ, इसीमें कामकी सारी सिद्धियाँ समाई हुई हैं।

आपको बिदा करनेसे पहले फिर एक बार मैं यह दोहरानेकी इजाजत चाहता हूँ कि:

(१) अपने मनका राज्य स्वराज्य है।

(२) उसकी कुंजी सत्याग्रह, आत्मबल या करुणा-बल है।

(३) उस बलको आजमानेके लिए स्वदेशीको पूरी तरह अपनानेकी ज़रूरत है।

(४) हम जो करना चाहते हैं वह अंग्रेजोंके लिए (हमारे मनमें) द्वेष है इसलिए या उन्हें सजा देनेके लिए नहीं करें, बल्कि इसलिए करें कि ऐसा करना हमारा कर्तव्य है। मतलब यह कि अंग्रेज अगर नमक-महसूल रद कर दें, लिया हुआ धन वापस कर दें, सब हिन्दुस्तानियोंको बड़े बड़े ओहदे दे दें और अंग्रेजी लश्कर हटा लें, तो हम उनकी मिलोंका कपड़ा पहनेंगे, या अंग्रेजी भाषा काममें लायेंगे, या उनकी हुनर-कलाका उपयोग करेंगे सो बात नहीं है। हमें यह समझना चाहिये कि वह सब दरअसल नहीं करने जैसा है, इसलिए हम उसे नहीं करेंगे।

मैंने जो कुछ कहा है वह अंग्रेजोंके लिए द्वेष होनेके कारण नहीं, बल्कि उनकी सभ्यताके लिए द्वेष होनेके कारण कहा है।

मुझे लगता है कि हमने स्वराज्यका नाम तो लिया, लेकिन उसका स्वरूप हम नहीं समझे हैं। मैंने उसे जैसा समझा है वैसा यहाँ बतानेकी कोशिश की है।

मेरा मन गवाही देता है कि ऐसा स्वराज्य पानेके लिए मेरा यह शरीर समर्पित[२] है।

  1. फ़र्ज।
  2. भेंट, नज़र किया हुआ।