पृष्ठ:Hind swaraj- MK Gandhi - in Hindi.pdf/१२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।

११


हर्ड, कुमारी रैथबोन वगैरा अनेक नामी लेखक-लेखिकाओंके लेख छपे हैं। उनमें से कुछ तो शांतिवादी और समाजवादीके तौर पर मशहूर हैं। लेकिन जिनके विचार शांतिवाद और समाजवादके खिलाफ हैं, ऐसे लोगोंके लेख भी इस अंकमें आये होते तो अंक कैसा होता! जो लेख दिये गये हैं उनकी व्यवस्था इस तरह की गई है कि ‘शुरूके लेखोंमें जो आलोचनायें और उज्र आये हैं, उनमें से बहुतोंके जवाब बादके लेखोंमें आ जाते हैं। लेकिन दो-एक टीकायें लगभग सब लेखकोंने की हैं, इसलिए पहले उनका विचार करना ठीक होगा। कुछ बातें ऐसी कही गई हैं, जिन्हें तुरन्त स्वीकार कर लेना चाहिये। अध्यापक सॉडीने लिखा है कि वे हालमें ही हिन्दुस्तान आये थे और यहाँ उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं देखा जिसे ऊपर-ऊपरसे देखने पर ऐसा लगे कि ‘हिन्द स्वराज्य' में बताये हुए सिद्धान्तों[१] को कुछ ज्यादा सफलता मिली है। यह बिलकुल सच बात है। ऐसी ही सही बात मि० कोलने कही है कि गांधीजीकी ‘सिर्फ अकेलेकी बात सोचनी हो तो वे ऐसे स्वराज्यके नजदीक इनसान जितना पहुँच सकता है उतना पहुँच ही चुके हैं। लेकिन उसके अलावा एक और सवाल रहता है; वह यह कि इनसान इनसानके बीच जो खाई है, खुद अकेले अमुक आचरण करना और दुसरोंको उनकी बुद्धिके मुताबिक आचरण करने में मदद करना-इन दोनोंके बीच जो अंतर है उसे कैसे पाटा जाय? इस दूसरी चीजके लिए तो औरोंके साथ रहकर, उनमें से एक बनकर, उनके साथ तादात्म्य-एकता साधकर मनुष्यको आचरण करना पड़ता है; एक ही समयमें अपना असली रूप और दूसरेका धारण किया हुआ रूप यानी व्यक्तित्व( जिसे खुद जाँच सके, जिसकी टीका-टिप्पणी कर सके और जिसकी कीमत आंक सके), ऐसे दो तरहके वरताव रखने पड़ते हैं।गांधीजीने अपने आचरणकी साधनाको आखिरी हद तक पहुँचाया ज़रूर है, लेकिन इस दुसरे सवालको, खुदको संतोष हो इस तरह, वे हल नही कर पाये हैं। फिर जॉन मिडलटन मरी कहते हैं वह भी सही है कि 'अहिंसाको अगर सिर्फ

  1. उसूलों।