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राजनीतिक[१] दबावके एक साधनके तौर पर इस्तेमाल किया जाय, तो उसकी शक्ति जल्दी खतम होती है।' और फिर सवाल यह उठता है कि ‘ऐसी अहिंसाको क्या सच्ची अहिंसा कहा जा सकता है?'

लेकिन यह सारी क्रिया लगातार विकासकी क्रिया है। उस साध्य[२]की सिद्धिके लिए कोशिश करते करते मनुष्य साधन[३]की संपूर्णताके लिए भी कोशिश करता रहता है। सैकड़ों बरस पहले बुद्ध और ईसा मसीहने अहिंसा और प्रेमके सिद्धान्तका उपदेश किया था। इन सैकड़ों बरसोंमें इक्केदुक्के व्यक्तियोंने छोटे-छोटे और सीमित[४] प्रश्नोंमें उसका प्रयोग किया है। गांधीजी के बारे में एक बात स्वीकर हो चुकी है, जिसका जिक्र करते हुए इस लेख-संग्रह[५]में जिराल्ड हर्डने कहा है कि ‘गांधीजीके प्रयोगमें सारे जगतको दिलचस्पी है, और उसका महत्त्व[६] युगों तक कायम रहेगा। इसका कारण यह है कि उन्होंने समूहको लेकर या राष्ट्रीय पैमाने पर उसका प्रयोग करनेकी कोशिश की है।' उस प्रयोगकी कठिनाइयाँ तो साफ हैं, लेकिन गांधीजीको भरोसा है कि इन मुसीबतोंको पार करना नामुमकिन नहीं है। हिन्दुस्तानमें १९२१ में वह प्रयोग नामुमकिन मालूम हुआ और उसे छोड़ देना पड़ा। लेकिन जो बात उस समय नामुमकिन थी, वह १९३० में मुमकिन हुई। अब भी बहुत बार यह सवाल उठता है कि ‘अहिंसक साधनका अर्थ क्या है?' उस शब्दका सबको मंजूर हो ऐसा अर्थ और उसकी मर्यादा[७] तय करने और उसे चालू करने से पहले अहिंसका लंबे अरसे तक प्रयोग और आचरण[८] करनेकी ज़रूरत है। पश्चिमके विचारक अकसर भूल जाते हैं कि अहिंसाके आचरणमें सबसे ज़रूरी और न टाली जा सकनेवाली चीज प्रेम है; और शुद्ध नि:स्वार्थ प्रेम मनकी और शरीरकी बेदाग-निष्कलंक शुद्धिके बिना संभव नहीं है और प्राप्त नहीं किया जा सकता।

‘हिन्द स्वराज्य'की प्रशंसाभरी समालोचनामें सब लेखकोंने एक बातका

  1. सियासी।
  2. मकसद।
  3. ज़रिया।
  4. महदूद।
  5. मजमुआ।
  6. अहमियत।
  7. हद।
  8. अमल।