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गांधीजीने मंजूर करते हुए कहा: ‘त्याग करना भी पड़े। लेकिन एक बात मैं साफ करना चाहूँगा। हम जो कुछ करें उसमें मुख्य विचार इनसानके भलेका होना चाहिये। ऐसे यंत्र नहीं होने चाहिये जो काम न रहनेके कारण आदमीके अंगोंको जड़ और बेकार बना दें। इसलिए यंत्रोंको मुझे परखना होगा। जैसे, सिंगरकी सीनेकी मशीनका मैं स्वागत करूंगा। आजकी सब खोजोंमें जो बहुत कामकी थोड़ी खोजें हैं, उनमें से एक यह सीनेकी मशीन है। उसकी खोजके पीछे अद्भुत इतिहास है। सिंगरने अपनी पत्नीको सीने और बखिया लगानेका उकतानेवाला काम करते देखा। पत्नीके प्रति रहे उसके प्रेमने गैर-ज़रुरी मेहनतसे उसे बचानेके लिए सिगंरको ऐसी मशीन बनानेकी प्रेरणा की। ऐसी खोज करके उसने न सिर्फ अपनी पत्नीका ही श्रम बचाया, बल्कि जो भी ऐसी सीनेकी मशीन खरीद सकते हैं उन सबको हाथसे सीनेके ऊबानेवाले श्रमसे छुड़ाया है।'

रामचन्द्रन्ने कहा: 'लेकिन सिंगरकी सीनेकी मशीनें बनानेके लिए तो बड़ा कारखाना चाहिये और उसमें भौतिक शक्तिसे चलनेवाले यंत्रोंका उपयोग करना ही पड़ेगा।'

रामचन्द्रन्के इस विरोधमें सिर्फ ज्यादा जाननेकी इच्छा ही थी। गांधीजीने मुस्कराते हुए कहा: ‘हां, लेकिन मैं इतना कहनेकी हद तक समाजवादी तो हूँ ही कि ऐसे कारखानोंका मालिक राष्ट्र हो या जनताकी सरकारकी ओरसे ऐसे कारखाने चलाये जायें। उनकी हस्ती नफेके लिए नहीं बल्कि लोगोंके भलेके लिए हो। लोभकी जगह प्रेमको कायम करनेका उसका उद्देश्य हो। मैं तो यह चाहता हूँ कि मज़दूरोंकी हालत में कुछ सुधार हो। धनके पीछे आज जो पागल दौड़ चल रही है वह रुकनी चाहिये। मजदूरोंको सिर्फ अच्छी रोजी मिले, इतना ही बस नहीं है। उनसे हो सके ऐसा काम उन्हें रोज मिलना चाहिये। ऐसी हालतमें यंत्र जितना सरकारको या उसके मालिकको लाभ पहुंचायेगा, उतना ही लाभ उसके चलानेवाले