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हिन्द स्वराज्य

संपादक: आप ऊब गये हैं,यह दिखाता है कि आपका मिज़ाज उतावला है। लेकिन जो नौजवान अपने माँ-बापके ठंडे मिज़ाजसे ऊब जाते हैं और वे(मां-बाप) अगर अपने साथ न दौड़ें तो गुस्सा होते हैं, वे अपने मां-बाप का अनादर[१] करते हैं ऐसा हम समझते हैं। प्रोफेसर गोखलेके बारेमें भी ऐसा ही समझना चाहिये। क्या हुआ अगर प्रोफेसर गोखले हमारे साथ नहीं दौड़ते हैं? स्वराज्य भुगतनेकी इच्छा रखने वाली प्रजा अपने बुजुर्गोंका तिरस्कार[२] नहीं कर सकती। अगर दूसरे की इज़्ज़त करनेकी आदत हम खो बैठें, तो हम निकम्मे हो जायेंगे। जो प्रौढ़[३] और तजरबेकार हैं, वे ही स्वराज्य भुगत सकते हैं, न कि बे-लगाम लोग। और देखिये कि जब प्रोफेसर गोखलेने हिन्दुस्तानकी शिक्षा[४] के लिए त्याग किया तब ऐसे कितने हिन्दुस्तानी थे? मैं तो खास तौर पर मानता हूँ कि प्रोफेसर गोखले जो कुछ भी करते हैं वह शुद्ध भावसे और हिन्दुस्तानका हित मानकर करते हैं। हिन्दके लिए अगर अपनी जान भी देनी पड़े तो वे दे देंगे, ऐसी हिन्दके लिए उनकी भक्ति है। वे जो कुछ कहते हैं वह किसी की खुशामद करने के लिए नहीं, बल्कि सही मानकर कहते हैं। इसलिए हमारे मनमें उनके लिए पूज्य भाव होना चाहिये।

पाठक: तो क्या वे साहब जो कहते हैं उसके मुताबिक हमें भी करना चाहिये?

संपादक: मैं ऐसा कुछ नहीं कहता। अगर हम शुद्ध बुद्धिसे अलग राय रखते हैं, तो उस रायके मुताबिक चलनेकी सलाह खुद प्रोफेसर साहब हमें देंगे। हमारा मुख्य काम तो यह है कि हम उनके कामोंकी निन्दा न करें; हमसे वे महान हैं ऐसा मानें और यकीन रखें कि उनके मुकाबिलेमें हमने हिन्दके लिए कुछ भी नहीं किया है। उनके बारे में कुछ अखबार जो अशिष्टतापूर्वक[५] लिखते हैं उसकी हमें निन्दा करनी चाहिये और प्रोफेसर गोखले जैसोंको हमें स्वराज्य के स्तंभ[६] मानना चाहिये। उनके ख़याल गलत और हमारे ही सही हैं, या हमारे ख़यालों के मुताबिक़ न बरतनेवाले देशके

  1. बेअदबी।
  2. बेइज़्ज़ती, नफ़रत।
  3. पुख्ता।
  4. तालीम।
  5. बेअदबीसे।
  6. खंभ।