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स्वराज्य क्या है?


तब भी अगर कोई ऐसा अर्थका अनर्थ[१] करें कि वे यहीं रहते हैं, तो मुझे उसकी परवाह नहीं होगी। तब फिर हम ऐसा मानेंगे कि हमारी भाषामें कुछ लोग 'जाना'का अर्थ 'रहना' करते हैं।

संपादक: अच्छा, हम मान लें कि हमारी माँगके मुताबिक अंग्रेज़ चलें गये। उसके बाद आप क्या करेंगे?

पाठक: इस सवालका जवाब अभीसे दिया ही नहीं जा सकता। वे किस तरह जाते हैं, उस पर बादकी हालतका आधार रहेगा। मान लें कि आप कहते हैं उस तरह वे चले गये, तो मुझे लगता है कि उनका बनाया हुआ विधान[२] हम चालू रखेंगे और राजका कारोबार चलायेंगे। कहनेसे ही वे चले जायें तो हमारे पास लश्कर तैयार ही होगा, इसलिए हमें राजकाज चलानेमें कोई मुश्किल नहीं आयेगी।

संपादक: आप भले ही ऐसा मानें, लेकिन मैं नहीं मानूँगा। फिर भी मैं इस बात पर ज्यादा बहस नहीं करना चाहता। मुझे तो आपके सवालका जवाब देना है। वह जवाब मैं आपसे ही कुछ सवाल करके अच्छी तरह दे सकता हूँ। इसलिए कुछ सवाल आपसे करता हूँ। हम अंग्रेजोंको क्यों निकालना चाहते हैं?

पाठक: इसलिए कि उनके राज-कारोबारसे देश कंगाल होता जा रहा है। वे हर साल देशसे धन ले जाते हैं। वे अपनी ही चमड़ीके लोगोंको बड़े ओहदे देते हैं, हमें सिर्फ गुलामीमें रखते हैं, हमारे साथ बेअदबीका बरताव करते हैं और हमारी जरा भी परवा नहीं करते।

संपादक: अगर वे धन बाहर न ले जायें, नम्र बन जायें और हमें बड़े ओहदे दें, तो उनके रहनेमें आपको कुछ हर्ज है?

पाठक: यह सवाल ही बेकार है। बाघ अपना रूप[३]पलट दे तो उसकी भाईबन्दी से कोई नुकसान है? ऐसा सवाल आपने पूछा, यह सिर्फ वक्त बरबाद करने के खातिर ही। अगर बाघ अपना स्वभाव[४] बदल सके, तो अंग्रेज लोग अपनी आदत छोड़ सकते हैं। जो कभी होनेवाला नहीं है वह होगा,

  1. सहीका ग़लत अर्थ।
  2. दस्तूर।
  3. सूरत।
  4. मिज़ाज।