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हिन्द स्वराज्य


पर उसका असर होता जाय। लेकिन इससे उलटे इतना तो सब कबूल करते हैं कि पार्लियामेन्टके मेम्बर दिखावटी और स्वार्थी[१] पाये जाते हैं। सब अपना मतलब साधनेकी सोचते हैं। सिर्फ डरके कारण ही पार्लियामेन्ट कुछ काम करती है। जो काम आज किया वह कल उसे रद करना पड़ता है। आज तक एक भी चीजको पार्लियामेन्टमें ठिकाने लगाया हो ऐसी कोई मिसाल देखनेमें नहीं आती। बड़े सवालोंकी चर्चा जब पार्लियामेन्टमें चलती है, तब उसके मेम्बर पैर फैलाकर लेटते हैं या बैठे बैठे झपकियां लेते हैं। उस पार्लियामेन्टमें मेम्बर इतने जोरोंसे चिल्लाते हैं कि सुननेवाले हैरानपरेशान हो जाते हैं। उसके एक महान लेखकने उसे 'दुनियाकी बातूनी’ जैसा नाम दिया है। मेम्बर जिस पक्ष[२] अगर कोई मेम्बर इसमें अपवादरूप[३] निकल आये, तो उसकी कमबख्ती ही समझिये। जितना समय और पैसा पार्लियामेन्ट खर्च करती है उतना समय और पैसा अगर अच्छे लोगोंको मिले तो प्रजाका उद्धार[४] हो जाय। ब्रिटिश पार्लियामेन्ट महज़ प्रजाका खिलौना है और वह खिलौना प्रजाको भारी खर्चमें डालता है। ये विचार मेरे खुदके हैं ऐसा आप न मानें। बड़े और विचारशील अंग्रेज ऐसा विचार रखते हैं। एक मेम्बरने तो यहाँ तक कहा है कि पार्लियामेन्ट धर्मिष्ठ[५] आदमीके लायक नहीं रही। दूसरे मेम्बरने तो कहा है कि पार्लियामेन्ट एक ‘बच्चा' (बेबी) है। बच्चोंको कभी आपने हमेशा बच्चे ही रहते देखा है? आज सात सौ बरसके बाद भी अगर पार्लियामेन्ट बच्चा ही हो, तो वह बड़ी कब होगी?

पाठक: आपने मुझे सोचमें डाल दिया। यह सब मुझे तुरन्त मान लेना चाहिये, ऐसा तो आप नहीं कहेंगे। आप बिलकुल निराले विचार मेरे मनमें पैदा कर रहे हैं। मुझे उन्हें हजम करना होगा। अच्छा, अब ‘बेसवा' शब्दका विवेचन[६] कीजिये।

संपादक: मेरे विचारोंको आप तुरन्त नहीं मान सकतें, यह बात ठीक है। उसके बारेमें आपको जो साहित्य पढ़ना चाहिये वह आप पढेंगे, तो आपको

  1. खुदगरज।
  2. दल, पार्टी।
  3. इस्तुनाके तौर पर।
  4. बेहतर हालत।
  5. दीनदार।
  6. तफ़सीर।