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हिन्द स्वराज्य

पाठक : अच्छा, तो अब आप रेल-पुराण सुनाइये।

संपादक : आपके दिलमें यह बात तुरन्त उठेगी कि अगर रेल न हो तो अंग्रेजोंका काबू हिन्दुस्तान पर जितना है उतना तो नहीं ही रहेगा। रेलसे महामारी फैली है। अगर रेलगाड़ी न हो तो कुछ ही लोग एक जगहसे दूसरी जगह जायेंगे और इस कारण संक्रामक[१] रोग सारे देशमें नहीं पहुँच पायेंगे। पहले हम कुदरती तौर पर ही ‘सेग्रेगेशन'-सूतक-पालते थे। रेलसे अकाल बढे हैं, क्योंकि रेलगाड़ीकी सुविधा[२]के कारण लोग अपना अनाज बेच डालते हैं। जहाँ महंगाई हो वहाँ अनाज खिंच जाता है, लोग लापरवाह बनते हैं और उससे अकालका दुख बढ़ता है। रेलसे दुष्टता[३] बढ़ती है। बुरे लोग अपनी बुराई तेजीसे फैला सकते हैं। हिन्दुस्तानमें जो पवित्र[४] स्थान थे, वे अपवित्र[५] बन गये हैं। पहले लोग बड़ी मुसीबतसे वहाँ जाते थे। ऐसे लोग वहाँ सच्ची भावनासे ईश्वरको भजने जाते थे; अब तो ठगोंकी टोली सिर्फ़ ठगनेके लिए वहाँ जाती है।

पाठक : यह तो आपने इकतरफा बात कही। जैसे खराब लोग वहाँ जा सकते हैं वैसे अच्छे भी तो जा सकते हैं। वे क्यों रेलगाड़ीका पूरा लाभ नहीं लेते?

संपादक : जो अच्छा होता है वह बीरबहूटीकी तरह धीरे चलता है। उसकी रेलसे नहीं बनती। अच्छा करनेवालेके मनमें स्वार्थ नहीं रहता। वह जल्दी नहीं करेगा। वह जानता है कि आदमी पर अच्छी बातका असर डालनेमें बहुत समय लगता है। बुरी बात ही तेजीसे बढ़ सकती है। घर बनाना मुश्किल है, तोड़ना सहल है। इसलिए रेलगाड़ी हमेशा दुष्टताका ही फैलाव करेगी, यह बराबर समझ लेना चाहिये। उससे अकाल फैलेगा या नहीं, इस बारेमें कोई शास्रकार मेरे मनमें घड़ी भर शंका पैदा कर सकता है; लेकिन रेलसे दुष्टता बढ़ती है यह बात जो मेरे मनमें जम गयी है वह मिटनेवाली नहीं है।

पाठक : लेकिन रेलका सबसे बड़ा लाभ दूसरे सब नुकसानोंको भुला देता है। रेल है तो आज हिन्दुस्तानमें एक-राष्ट्रका जोश देखनेमें आता है। इसलिए मैं तो कहूँगा कि रेलके आनेसे कोई नुकसान नहीं हुआ।

  1. फैलानेवाले।
  2. सुभीता।
  3. नीचता।
  4. पाक।
  5. नापाक।