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हिन्दुस्तानकी दशा-३


पर मनुष्यने अक़लका उपयोग भगवानको भूलनेमें किया। मैं अपनी कुदरती हदके मुताबिक अपने आसपास रहने वालोंकी ही सेवा कर सकता हूँ; पर मैंने तुरन्त अपनी मगरूरीमें ढूँढ़ निकाला कि मुझे तो सारी दुनियाकी सेवा अपने तनसे करनी चाहिये। ऐसा करनेमें अनेक धर्मोंकि और कई तरहके लोगोंका साथ होगा। यह बोझ मनुष्य उठा ही नहीं सकता और इसलिए अकुलाता है। इस विचारसे आप समझ लेंगे कि रेलगाड़ी सचमुच एक तूफानी साधन है। मनुष्य रेलगाड़ीका उपयोग करके भगवानको भूल गया है।

पाठक : पर मैं तो अब जो सवाल मैंने उठाया है उसका जवाब सुननेको अधीर हो रहा हूँ। मुसलमानोंके आनेसे हमारा एक-राष्ट्र रहा या मिटा?

संपादक : हिन्दुस्तानमें चाहे जिस धर्मके आदमी रह सकते हैं; उससे वह एक-राष्ट्र मिटनेवाला नहीं है। जो नये लोग उसमें दाखिल होते हैं, वे उसकी प्रजाको तोड़ नहीं सकते, वे उसकी प्रजामें घुलमिल जाते हैं। ऐसा हो तभी कोई मुल्क एक-राष्ट्र माना जायगा। ऐसे मुल्कमें दूसरे लोगोंका समावेश करनेका गुण होना चाहिये। हिन्दुस्तान ऐसा था और आज भी है। यों तो जितने आदमी उतने धर्म ऐसा मान सकते हैं। एक-राष्ट्र होकर रहनेवाले लोग एक-दूसरेके धर्ममें दखल नहीं देते; अगर देते हैं तो समझना चाहिये कि वे एक-राष्ट्र होने लायक नहीं हैं। अगर हिन्दू माने कि सारा हिन्दुस्तान सिर्फ़ हिन्दुओंसे भरा होना चाहिये, तो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ़ मुसलमान ही रहें, तो उसे भी सपना ही समझिये। फिर भी हिन्दू, मुसलमान, पारसी, ईसाई, जो इस देशको अपना वतन मानकर बस चुके हैं एक-देशी, एक-मुल्की हैं, वे देशी-भाई हैं, और उन्हें एक-दूसरेके स्वार्थके लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा।

दुनियाके किसी भी हिस्सेमें एक-राष्ट्रका अर्थ एक-धर्म नहीं किया गया है; हिन्दुस्तानमें तो ऐसा था ही नहीं।

पाठक : लेकिन दोनों कौमोंके कट्टर बैरका क्या?

संपादक : ‘कट्टर बैर' शब्द दोनोंके दुश्मनने खोज निकाला है। जब हिन्दू-मुसलमान झगड़ते थे तब वे ऐसी बातें भी करते थे। झगड़ा तो हमारा सबका