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हिन्द स्वराज्य

वे मजदूरसे ज्यादा रोज़ी क्यों माँगते हैं? उनकी जरूरतें मज़दूरसे ज्यादा क्यों हैं? उन्होंने मज़दूरसे ज्यादा देशका क्या भला किया है? क्या भला करनेवालेको ज्यादा पैसा लेनेका हक है? और अगर पैसेके खातिर उन्होंने भला किया हो, तो उसे भला कैसे कहा जाय? यह तो उस पेशेका जो गुण है वह मैंने बताया।

वकीलोंके कारण हिन्दू-मुसलमानोंके बीच कुछ दंगे हुए हैं, यह तो जिन्हें अनुभव है वे जानते होंगे। उनसे कुछ खानदान बरबाद हो गये हैं। उनकी बदौलत भाईयोंमें ज़हर दाखिल हो गया है। कुछ रियासतें वकीलोंके जालमें फँसकर क़र्ज़दार हो गयी हैं। बहुतसे गरासिये[१] इन वकीलोंकी कारस्तानीसे लुट गये हैं। ऐसी बहुतसी मिसालें दी जा सकती हैं।

लेकिन वकीलोंसे बड़ेसे बड़ा नुकसान तो यह हुआ है कि अंग्रेजोंका जुआ हमारी गर्दन पर मजबूत जम गया है। आप सोचिये। क्या आप मानते हैं कि अंग्रेजी अदालतें यहाँ न होतीं तो वे हमारे देशमें राज कर सकते थे? ये अदालतें लोगोंके भलेके लिए नहीं हैं। जिन्हें अपनी सत्ता कायम रखनी है, वे अदालतोंके ज़रिये लोगोंको बसमें रखते हैं। लोग अगर खुद अपने झगड़े निबटा लें, तो तीसरा आदमी उन पर अपनी सत्ता नहीं जमा सकता। सचमुच जब लोग खुद मार-पीट करके या रिश्तेदारोंको पंच बनाकर अपना झगड़ा निबटा लेते थे तब वे बहादुर थे। अदालतें आयीं और वे कायर बन गये। लोग आपसमें लड़ कर झगड़े मिटायें, यह जंगली माना जाता था। अब तीसरा आदमी झगड़ा मिटाता है, यह क्या कम जंगलीपन है? क्या कोई ऐसा कह सकेगा कि तीसरा आदमी जो फैसला देता है वह सही फैसला ही होता है? कौन सच्चा है, यह दोनों पक्षके लोग जानते हैं। हम भोलेपनमें मान लेते हैं कि तीसरा आदमी हमसे पैसे लेकर हमारा इन्साफ़ करता है।

इस बातको अलग रखें। हकीकत तो यही दिखानी है कि अंग्रेजोंने अदालतोंके ज़रिये हम पर अंकुश जमाया है और अगर हम वकील न बनें तो ये अदालतें चल ही नहीं सकतीं। अगर अंग्रेज ही जज होते, अंग्रेज ही वकील

  1. राजवंशी जागीरदार।