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हिन्दुस्तानकी दशा-५


होते और अंग्रेज ही सिपाही होते, तो वे सिर्फ़ अंग्रेजों पर ही राज करते। हिन्दुस्तानी जज और हिन्दुस्तानी वकीलके बगैर उनका काम चल नहीं सका। वकील कैसे पैदा हुए, उन्होने कैसी धांधल मचाई, यह सब अगर आप समझ सकें, तो मेरे जितनी ही नफ़रत आपको भी इस पेशेके लिए होगी। अंग्रेजी सत्ताकी एक मुख्य[१] कुंजी उनकी अदालतें हैं और अदालतोंकी कुंजी वकील हैं। अगर वकील वकालत करना छोड़ दें और वह पेशा वेश्याके पेशे जैसा नीच माना जाय, तो अंग्रेजी राज एक दिनमें टूट जाय। वकीलोंने हिन्दुस्तानी प्रजा पर यह तोहमत लगवाई है कि हमें झगड़े प्यारे हैं और हम कोर्ट-कचहरी रूपी पानीकी मछलियां हैं।

जो शब्द मैं वकीलोंके लिए इस्तेमाल करता हूँ, वे ही शब्द जजोंको भी लागू होते हैं। ये दोनों मौसेरे भाई हैं और एक-दूसरेको बल देनेवाले हैं।

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हिन्दुस्तानकी दशा-५

डॉक्टर

पाठक : वकीलोंकी बात तो हम समझ सकते हैं। उन्होंने जो अच्छा काम किया है वह जान-बूझकर नहीं किया, ऐसा यकीन होता है। बाकी उनके धंधेको देखा जाय तो वह कनिष्ठ[२] ही है। लेकिन आप तो डॉक्टरोंको भी उनके साथ घसीटते हैं। यह कैसे?

संपादक : मैं जो विचार आपके सामने रखता हूँ, वे इस समय तो मेरे अपने ही हैं। लेकिन ऐसे विचार मैंने ही किये हैं सो बात नहीं। पश्चिमके सुधारक खुद मुझसे ज्यादा सख्त शब्दोंमें इन धंधोंके बारेमें लिख गये हैं। उन्होंने वकीलों और डॉक्टरोंकी बहुत निंदा की है। उनमेंसे एक लेखकने एक ज़हरी पेड़का चित्र खींचा है, वकील-डॉक्टर वगैरा निकम्मे धंधेवालोंको उसकी शाखाओंके रूपमें बताया है और उस पेड़के तने पर नीति-धर्मकी कुल्हाड़ी

  1. बड़ी।
  2. बहुत हलका।