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हिन्द स्वराज्य


उठाई है। अनीतिको इन सब धंधोंकी जड़ बताया है। इससे आप यह समझ लेंगे कि मैं आपके सामने अपने दिमागसे निकाले हुए नये विचार नहीं रखता, लेकिन दूसरोंका और अपना अनुभव आपके सामने रखता हूँ।

डॉक्टरोंके बारेमें जैसे आपको अभी मोह है वैसे कभी मुझे भी था। एक समय ऐसा था जब मैंने खुद डॉक्टर होनेका इरादा किया था और सोचा था कि डॉक्टर बनकर क़ौमकी सेवा करूंगा। मेरा यह मोह अब मिट गया है। हमारे समाजमें वैद्यका धंधा कभी अच्छा माना ही नहीं गया, इसका भान अब मुझे हुआ है; और उस विचारकी कीमत मैं समझ सकता हूँ।

अंग्रेजोंने डॉक्टरी विद्यासे भी हम पर काबू जमाया है। डॉक्टरोंमें दंभकी भी कमी नहीं है। मुगल बादशाहको भरमानेवाला एक अंग्रेज डॉक्टर ही था। उसने बादशाहके घरमें कुछ बीमारी मिटाई, इसलिए उसे सिरोपाव मिला। अमीरोके पास पहुंचनेवाले भी डॉक्टर ही हैं।

डॉक्टरोंने हमें जड़से हिला दिया है। डॉक्टरोंसे नीम-हकीम ज्यादा अच्छे, ऐसा कहनेका मेरा मन होता है। इस पर हम कुछ विचार करें।

डॉक्टरोंका काम सिर्फ़ शरीरको संभालनेका है; या शरीरको संभालनेका भी नहीं है। उनका काम शरीरमें जो रोग पैदा होते हैं उन्हें दूर करनेका है। रोग क्यों होते हैं? हमारी ही गफ़लतसे। मैं बहुत खाऊँ और मुझे बदहजमी, अजीरन हो जाय; फिर मैं डॉक्टरके पास जाऊँ और वह मुझे गोली दे; गोली खाकर मैं चंगा हो जाऊँ और दुबारा खूब खाऊँ और फिरसे गोली लूँ। अगर मैं गोली न लेता तो अजीरनकी सजा भुगतता और फिरसे बेहद नहीं खाता। डॉक्टर बीचमें आया और उसने हदसे ज्यादा खानेमें मेरी मदद की। उससे मेरे शरीरको तो आराम हुआ, लेकिन मेरा मन कमज़ोर बना। इस तरह आखिर मेरी यह हालत होगी कि मैं अपने मन पर जरा भी काबू न रख सकूँगा।

मैंने विलास किया, मैं बीमार पड़ा; डॉक्टरने मुझे दवा दी और मैं चंगा हुआ। क्या मैं फिरसे विलास नहीं करूँगा? ज़रूर करूँगा। अगर डॉक्टर