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सच्ची सभ्यता कौनसी?

पाठक : आपने रेलको रद कर दिया, वकीलोंकी निन्दा की, डॉक्टरोंको दबा दिया। तमाम कलकाम[१]को भी आप नुकसानदेह मानेंगे, ऐसा मैं देख सकता हूँ। तब सभ्यता[२] कहें तो किसे कहें?

संपादक : इस सवालका जवाब मुश्किल नहीं है। मैं मानता हूँ कि जो सभ्यता हिन्दुस्तानने दिखायी है, उसको दुनियामें कोई नहीं पहुँच सकता। जो बीज हमारे पुरखोंने बोये हैं, उनकी बराबरी कर सके ऐसी कोई चीज देखनेमें नहीं आयी। रोम मिट्टीमें मिल गया, ग्रीसका सिर्फ़ नाम ही रह गया, मिस्रकी बादशाही चली गई, जापान पश्चिमके शिकंजेमें फँस गया और चीनका कुछ भी कहा नहीं जा सकता। लेकिन गिरा-टूटा जैसा भी हो, हिन्दुस्तान आज भी अपनी बुनियादमें मजबूत है।

जो रोम और ग्रीस गिर चुके हैं, उनकी किताबोंसे यूरोपके लोग सीखते हैं। उनकी गलतियां वे नहीं करेंगे ऐसा गुमान[३] रखते हैं। ऐसी उनकी कंगाल हालत है, जब कि हिन्दुस्तान अचल है, अडिग है। यही उसका भूषण है। हिन्दुस्तान पर आरोप लगाया जाता है कि वह ऐसा जंगली, ऐसा अज्ञान है कि उससे जीवनमें कुछ फेरबदल कराये ही नहीं जा सकते। यह आरोप हमारा गुण[४] है, दोष[५] नहीं। अनुभव[६]से जो हमें ठीक लगा है, उसे हम क्यों बदलेंगे? बहुतसे अक़ल देनेवाले आतेजाते रहते हैं, पर हिन्दुस्तान अडिग रहता है। यह उसकी खूबी है, यह उसका लंगर है।

सभ्यता वह आचरण[७] है जिससे आदमीं अपना फ़र्ज अदा करता है। फ़र्ज अदा करनेके मानी है नीतिका पालन करना। नीतिके पालनका मतलब है अपने मन और इन्द्रियोंको बसमें रखना। ऐसा करते हुए हम अपनेको

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  1. यंत्रकाम।
  2. तहजीब।
  3. अभिमान।
  4. सिफ़त।
  5. नुक़्स।
  6. तजरबा।
  7. बरताव।