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हिन्दुस्तान कैसे आज़ाद हो?

और फिर सारा हिन्दुस्तान उसमें (गुलामीमें) घिरा हुआ नहीं है। जिन्होंने पश्चिमकी शिक्षा पाई है और जो उसके पाशमें[१] फँस गये हैं, वे ही गुलामीमें घिरे हुए हैं। हम जगत को अपनी दमड़ीके नापसे नापते हैं। अगर हम गुलाम हैं, तो जगतको भी गुलाम मान लेते हैं। हम कंगाल दशामें हैं, इसलिए मान लेते हैं कि सारा हिन्दुस्तान ऐसी दशामें है। दरअसल ऐसा कुछ नहीं है। फिर भी हमारी गुलामी सारे देशकी गुलामी है, ऐसा मानना ठीक है। लेकिन ऊपरकी बात हम ध्यानमें रखें तो समझ सकेंगे कि हमारी अपनी गुलामी मिट जाय, तो हिन्दुस्तानकी गुलामी मिट गई ऐसा मान लेना चाहिये। इसमें अब आपको स्वराज्यकी व्याख्या[२] भी मिल जाती है। हम अपने ऊपर राज करें वही स्वराज्य है; और वह स्वराज्यहमारी हथेलीमें है।

इस स्वराज्यको आप सपने जैसा न मानें। मनसे मानकर बैठे रहनेका भी यह स्वराज्य नहीं है। यह तो ऐसा स्वराज्य है कि आपने अगर इसका स्वाद चख लिया हो, तो दूसरोंको इसका स्वाद चखानेके लिए आप ज़िन्दगी भर कोशिश करेंगे। लेकिन मुख्य[३] बात तो हर शख्सके स्वराज्य भोगनेकी है। डूबता आदमी दूसरेको नहीं तारेगा, लेकिन तैरता आदमी दूसरेको तारेगा। हम खुद गुलाम होंगे और दूसरोंको आज़ाद करनेकी बात करेंगे, तो वह संभव नहीं है।

लेकिन इतना काफी नहीं है। हमें और भी आगे सोचना होगा।

अब इतना तो आपकी समझमें आया होगा कि अंग्रेजोंको देशसे निकालनेका मक़सद सामने रखनेकी ज़रूरत नहीं है। अगर अंग्रेज हिन्दुस्तानी बनकर रहें तो हम उनका समावेश यहाँ कर सकते हैं। अंग्रेज अगर अपनी सभ्यताके साथ रहना चाहें, तो उनके लिए हिन्दुस्तानमें जगह नहीं है। ऐसी हालत पैदा करना हमारे हाथमें है।

पाठक : अंग्रेज हिन्दुस्तानी बनें, यह नामुमकिन है।

संपादक : हमारा ऐसा कहना यह कहनेके बराबर है कि अंग्रेज मनुष्य नहीं हैं। वे हमारे जैसे बनें या न बनें, इसकी हमें परवाह नहीं है। हम अपना घर

  1. फंदेमें।
  2. तशरीह।
  3. खास या अहम्।