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हिन्द स्वराज्य


साफ करें। फिर रहने लायक लोग ही उसमें रहेंगे; दूसरे अपने-आप चले जायेंगे। ऐसा अनुभव तो हर आदमीको हुआ होगा।

पाठक : ऐसा होनेकी बात तवारीख़में[१] तो हमने नहीं पढ़ी।

संपादक : जो चीज तवारीख़में नहीं देखी वह कभी नहीं होगी, ऐसा मानना मनुष्यकी प्रतिष्ठामें अविश्वास करना है। जो बात हमारी अक़ल में आ सके, उसे आखिर हमें आजमाना तो चाहिये ही।

हर देशकी हालत एकसी नहीं होती। हिन्दुस्तानकी हालत विचित्र है। हिन्दुस्तानका बल असाधारण है। इसलिए दूसरी तवारीख़ोंसे हमारा कम संबंध है। मैंने आपको बताया कि दूसरी सभ्यतायें मिट्टीमें मिल गयीं, जब कि हिन्दुस्तानी सभ्यताको आँच नहीं आयी है।

पाठक : मुझे ये सब बातें ठीक नहीं लगतीं। हमें लड़कर अंग्रेजोंको निकालना ही होगा, इसमें कोई शक नहीं। जब तक वे हमारे मुल्कमें हैं, तब तक हमें चैन नहीं पड़ सकता। 'पराधीन सपनेहु सुख नाहीं' ऐसा देखनेमें आता है। अंग्रेज यहाँ हैं इसलिए हम कमजोर होते जा रहे हैं। हमारा तेज चला गया है और हमारे लोग घबराये-से दीखते हैं। अंग्रेज हमारे देशके लिए यम (काल) जैसे हैं। उस यमको हमें किसी भी प्रयत्नसे भगाना होगा।

संपादक : आप अपने आवेशमें[२] मेरा सारा कहना भूल गये हैं। अंग्रेजोंको यहाँ लानेवाले हम हैं और वे हमारी बदौलत ही यहाँ रहते हैं। आप यह कैसे भूल जाते हैं कि हमने उनकी सभ्यता अपनायी है, इसलिए वे यहाँ रह सकते हैं? आप उनसे जो नफ़रत करते हैं वह नफ़रत आपको उनकी सभ्यतासे करनी चाहिये। फिर भी मान लें कि हम लड़कर उन्हें निकालना चाहते हैं। यह कैसे हो सकेगा?

पाठक : इटलीने किया वैसे। मैज़िनी और गेरीबाल्डीने जो किया, वह तो हम भी कर सकते हैं। वे महावीर थे, इस बातसे क्या आप इनकार कर सकेंगे?

  1. इतिहास।
  2. जोश।