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इटली और हिन्दुस्तान


ख़िलाफ लड़ना हो, तो हिन्दुस्तानको हथियारबन्द करना होगा। अगर ऐसा हो सकता हो, तो इसमें कितने साल लगेंगे? और तमाम हिन्दुस्तानियोंको हथियारबन्द करना तो हिन्दुस्तानको यूरोप-सा बनाने जैसा होगा। अगर ऐसा हुआ तो आज यूरोपके जो बेहाल है वैसे ही हिन्दुस्तानके भी होंगे। थोड़ेमें, हिन्दुस्तानको यूरोपकी सभ्यता अपनानी होगी। ऐसा ही होनेवाला हो तो अच्छी बात यह होगी कि जो अंग्रेज उस सभ्यतामें कुशल हैं, उन्हींको हम यहाँ रहने दें। उनसे थोड़ा-बहुत झगड़ कर कुछ हक हम पायेंगे, कुछ नहीं पायेंगे और अपने दिन गुजारेंगे।

लेकिन बात तो यह है कि हिन्दुस्तानकी प्रजा कभी हथियार नहीं उठायेगी। न उठाये यह ठीक ही है।

पाठक : आप तो बहुत आगे बढ़ गये। सबके हथियारबंद होनेकी ज़रूरत नहीं। हम पहले तो कुछ अंग्रेजोंका खून करके आतंक[१] फैलायेंगे। फिर तो थोड़े लोग हथियारबंद होगे, वे खुल्लमखुल्ला लड़ेंगे। उसमें पहले तो बीस-पचीस लाख हिन्दुस्तानी ज़रूर मरेंगे। लेकिन आखिर हम देशको अंग्रेजोंसे जीत लेंगे। हम गुरीला (डाकुओं जैसी) लड़ाई लड़कर अंग्रेजोंको हरा देंगे।

संपादक : आपका ख़याल हिन्दुस्तानकी पवित्र भूमिको राक्षसी[२] बनानेका लगता है। अंग्रेजोंका खून करके हिन्दुस्तानको छुड़ायेंगे, ऐसा विचार करते हुए आपको त्रास क्यों नहीं होता? खून तो हमें अपना करना चाहिये; क्योंकि हम नामर्द बन गये हैं, इसीलिए हम खूनका विचार करते हैं। ऐसा करके आप किसे आज़ाद करेंगे? हिन्दुस्तानकी प्रजा ऐसा कभी नहीं चाहती। हम जैसे लोग ही, जिन्होंने अधम सभ्यतारूपी भांग पी है, नशेमें ऐसा विचार करते हैं। खून करके जो लोग राज करेंगे, वे प्रजाको सुखी नहीं बना सकेंगे। धींगराने[३] जो खून किया है उससे या जो खून हिन्दुस्तानमें हुए हैं उनसे देशको फायदा हुआ है, ऐसा अगर कोई मानता हो तो यह बड़ी भूल करता है

  1. दहशत, त्रास।
  2. शैतानी।
  3. पंजाबी युवक मदनलाल धींगराने जुलाई,१९०९ में लंदनमें कर्नल सर कर्जन वाइलीको गोलीका निशाना बनाया था। उसे फांसीकी सजा मिली थी।