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हिन्द स्वराज्य


। धींगराको मैं देशाभिमानी मानता हूँ, लेकिन उसका देशप्रेम पागलपनसे भरा था। उसने अपने शरीरका बलिदान गलत तरीकेसे दिया। उससे अंतमें तो देशको नुकसान ही होनेवाला है।

पाठक : लेकिन आपको इतना तो कबूल करना ही होगा कि अंग्रेज इस खूनसे डर गये हैं, और लॉर्ड मॉर्लेने जो कुछ हमें दिया है वह ऐसे डरसे ही दिया है।

संपादक : अंग्रेज जैसे डरपोक प्रजा हैं वैसे बहादुर भी हैं। गोलाबारूदका असर उन पर तुरन्त होता है, ऐसा मैं मानता हूँ। संभव है, लॉर्ड मॉर्लेने हमें जो कुछ दिया वह डरसे दिया हो। लेकिन डरसे मिली हुई चीज जब तक डर बना रहता है तभी तक टिक सकती है।

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गोला-बारूद

पाठक : डरसे दिया हुआ जब तक डर रहे तभी तक टिक सकता है, यह तो आपने विचित्र बात कही। जो दिया सो दिया। उसमें फिर क्या हेरफेर हो सकता है?

संपादक : ऐसा नहीं है। १८५७ की घोषणा बलवेके अंतमें लोगोंमें शान्ति कायम रखनेके लिए की गई थी। जब शान्ति हो गई और लोग भोले दिलके बन गये तब उसका अर्थ बदल गया। अगर मैं सजाके डरसे चोरी न करूँ, तो सजाका डर मिट जाने पर चोरी करनेको मेरी फिरसे इच्छा होगी और मैं चोरी करूँगा। यह तो बहुत ही साधारण अनुभव[१] है; इससे इनकार नहीं किया जा सकता। हमने मान लिया है कि डाँट-डपटकर लोगोंसे काम लिया जा सकता है और इसलिए हम ऐसा करते आये हैं।

पाठक : आपकी यह बात आपके ख़िलाफ़ जाती है, ऐसा आपको नहीं लगता? आपको स्वीकार करना होगा कि अंग्रेजोंने खुद जो कुछ हासिल किया है, वह मार-काट करके ही हासिल किया है। आप कह चुके हैं कि (मार-काटसे) उन्होंने जो कुछ हासिल किया है वह बेकार है; यह मुझे याद

  1. तजरबा।