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हिन्द स्वराज्य


अपनी हालत को बराबर समझता है। इसका समावेश हमारे बुजुर्गोंने ‘एक नाहीं सब रोगोंकी दवा'में किया है। यह बल जिसमें है उसका हथियार-बल कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

बच्चा अगर आगमें पैर रखे, तो उसको दबानेकी मिसालकी छानबीन करनेमें तो आप हार जायेंगे। बच्चेके साथ आप क्या करेंगे? मान लीजिए कि बच्चा ऐसा जोर करे कि आपको मारकर वह आगमें जा पड़े। तब तो आगमें पड़े बिना वह रहेगा ही नहीं। इसका उपाय आपके पास यह है: या तो आगमें पड़नेसे रोकनेके लिए आप उसके प्राण ले लें, या उसका आगमें पड़ना आपसे देखा नहीं जाता इसलिए आप स्वयं आगमें पड़कर अपनी जान दे दें। आप बच्चेके प्राण तो नहीं ही लेंगे। आप में अगर संपूर्ण दयाभाव न हो, तो मुमकिन है कि आप अपने प्राण नहीं देंगे। तो फिर लाचारीसे आप बच्चेको आगमें कूदने देंगे। इस तरह आप बच्चे पर हथियार-बलका उपयोग नहीं करते हैं। बच्चे को आप और किसी तरह रोक सकें तो रोकेंगे; और वह बल कम दर्जेका लेकिन हथियार-बल ही होगा ऐसा भी आप न समझ लें। वह बल और ही प्रकार[१]का है। उसीको समझ लेना है।

बच्चेको रोकनेमें आप सिर्फ़ बच्चेका स्वार्थ देखते हैं। जिसके ऊपर आप अंकुश रखना चाहते हैं, उस पर उसके स्वार्थके लिए ही अंकुश रखेंगे। यह मिसाल अंग्रेजों पर जरा भी लागू नहीं होती। आप अंग्रेजों पर जो हथियार-बल का उपयोग करना चाहते हैं, उसमें आप अपना ही यानी प्रजाका स्वार्थ देखते हैं। उसमें दया जरा भी नहीं है। अगर आप यों कहें कि अंग्रेज जो अधम-नीच काम करते हैं वह आग है, वे आगमें अज्ञानके कारण जाते हैं और आप दयासे अज्ञानीको यानी बच्चेको उससे बचाना चाहते हैं, तो इस प्रयोगको आजमाने के लिए आपको जहाँ-जहाँ जो भी आदमी नीच काम करता होगा वहाँ वहाँ पहुँचना होगा और सामनेवालेके-बच्चे के-प्राण लेनेके बजाय अपने प्राणोंकी आहुति देनी पड़ेगी। इतना पुरुषार्थ[२] आप करना चाहें तो कर सकते हैं, आप स्वतंत्र हैं। पर यह बात बिलकुल असंभव है।

  1. तरह।
  2. बड़ा काम।